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ये मंदिर पहले ही बता देता है 'आने वाली है बारिश', वैज्ञानिक भी आजतक नहीं जान पाए रहस्य

Fri, 05 Apr 2019 09:29 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला
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जगन्नाथ मंदिर कानपुर - फोटो : File photo
भारत में ऐसे कई मंदिर हैं, जो अपने साथ कई रहस्य समेटे हुए हैं। ऐसा ही एक मंदिर उत्तर प्रदेश के कानपुर में है, जो बारिश की सटीक भविष्यवाणी करता है। कहते हैं कि अगर बारिश होने वाली हो तो इस मंदिर की छत चिलचिलाती धूप में भी टपकने लगती है और बारिश की शुरुआत होते ही इसकी छत से पानी टपकना बंद हो जाता है। 
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जगन्नाथ मंदिर कानपुर - फोटो : File photo
यह मंदिर कानपुर के भीतरगांव विकासखंड से ठीक तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित बेहटा गांव में है। यह भगवान जगन्नाथ के अति प्राचीन मंदिरों में से एक है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलदाऊ और सुभद्रा की काले चिकने पत्थरों की मूर्तियां विराजमान हैं। प्रांगण में सूर्यदेव और पद्मनाभम की मूर्तियां भी हैं। 
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भगवान जगन्नाथ यात्रा में उमड़े भक्त, जौनपुर - फोटो : File photo
जगन्नाथ पुरी की तरह इस गांव में भी स्थानीय लोगों द्वारा भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकाली जाती है। लोगों की आस्था मंदिर के साथ गहरे से जुड़ी है। लोग दर्शन करने के लिए आते रहते हैं।

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जगन्नाथ मंदिर, कानपुर - फोटो : Social media
यहां के लोग बताते हैं कि बारिश होने के छह-सात दिन पहले मंदिर की छत से पानी की बूंदें टपकने लगती हैं। इतना ही नहीं, वो बताते हैं कि जिस आकार की बूंदें टपकती हैं, उसी आधार पर बारिश भी होती है। इसमें हैरान करने वाली बात ये है कि यहां जैसे ही बारिश शुरू होती है, मंदिर की छत अंदर से पूरी तरह सूख जाती है। 
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जगन्नाथ मंदिर, कानपुर - फोटो : Social media
यह मंदिर कितना पुराना है और इसकी छत से पानी कैसे टपकता है और फिर बंद हो जाता है, इसका पता आजतक नहीं चल पाया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंदिर के पुजारी का कहना है कि पुरातत्व विभाग के लोग और वैज्ञानिक कई बार यहां आए, लेकिन इस रहस्य का पता लगाने में असफल रहे। 
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जगन्नाथ मंदिर, कानपुर - फोटो : Social media
पुरातत्व विभाग को अभी तक बस इतना ही पता चल पाया है कि मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य 11वीं सदी में किया गया था। इस मंदिर की बनावट किसी बौद्ध मठ की तरह है, जिसकी दिवारें 14 फीट मोटी हैं। इससे मंदिर के सम्राट अशोक के शासन काल में बनाए जाने के अनुमान लगाए जाते हैं। हालांकि मंदिर के बाहर मोर का निशान और चक्र बने होने से चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन के कार्यकाल में इसके बने होने के कयास भी लगाए जाते हैं।
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