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मकर संक्रांति से जुड़ा है महाभारत का रहस्य, भीष्म पितामह ने अर्जुन को बताई थी राज की बात

Mon, 07 Jan 2019 01:59 PM IST
kapil kumar फीचर डेस्क, अमर उजाला
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मकर संक्रांति के साथ ही कुंभ का महापर्व शुरू होने वाला है। भारत में सभी जगह इस त्योहार को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मानते हैं। यूं तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। सूर्य के एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करने को संक्रमण या संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिषीय मान्यता है कि पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तो उस विशेष काल को ही मकर संक्रांति कहते हैं। 
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इस बार 14 नहीं 15 जनवरी को मनाई जाएगी संक्रांति

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2012 से मकर संक्रांति की तिथि को लेकर उलझन की स्थिति बनती चली आ रही है। पिछले कुछ वर्षों में मकर संक्रांति की तिथि को लेकर काफी उहापोह की स्थिति बनी रहती है। साल 2019 में भी कुछ इसी तरह की स्थिति बनी हुई है। हालांकि इस साल मकर संक्रांति 15 जनवरी को है। सोमवार (14 जनवरी) की मध्य रात्रि में सूर्य का मकर में संक्रमण होगा जबकि मंगलवार 15 जनवरी को 12 बजे से पुण्यकाल है। इसलिए मंगलवार की सुबह से ही संक्रांति स्नान, दान शुरू हो जायेगा। 14 जनवरी को शाम 7:53 बजे सूर्य देव धनु से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। चूंकि सूर्य का राशि परिवर्तन सूर्यास्त के बाद होगा, इसके चलते पुण्यकाल और मकर संक्रांति के तहत 15 जनवरी को दान पुण्य का दौर होगा। मकर संक्रांति के साथ ही सूर्य दक्षिमायण से उत्तरायण हो जाएंगे। शास्त्रों के नियम के अनुसार रात में संक्रांति होने पर अगले दिन संक्रांति मनाई जाती है। इस नियम के अनुसार ही इस बार संक्रांति 14 नहीं 15 जनवरी को मनाई जाएगी। 
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मकर संक्रांती की पहली कथा

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- फोटो : Social Media
महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन को ही चुना था, क्योंकि मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं, इसलिए संक्रांति मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। 

मकर संक्रांती की दूसरी कथा

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- फोटो : Social Media
महाभारत की एक दूसरी कथा के अनुसार, युद्ध करते हुए भीष्म पितामह ने वचनबद्ध होने के कारण कौरव पक्ष की ओर से युद्ध किया था किंतु सत्य एवं न्याय की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं ही अपनी मृत्यु का सबसे बड़ा रहस्य अर्जुन को बताया था। अर्जुन ने शिखंडी की आड़ में भीष्म पितामह पर इस कदर बाणों की वर्षा की कि उनका पूरा शरीर बाणों से बिंध गया तथा वह बाण शय्या पर लेट गए किंतु उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति तथा प्रभु कृपा के चलते मृत्यु का वरण नहीं किया क्योंकि उस समय सूर्य दक्षिणायन था। जैसे ही सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया और सूर्य उत्तरायण हुए। भीष्म ने अर्जुन के बाण से निकली गंगा की धार का पान कर प्राण त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया। मकर संक्रांति पर गंगा स्नान करना उत्तर भारत में इसलिए भी काफी विशेष माना जाता है। मकर संक्रांति को सूर्य एवं अग्नि की पूजा से भी जोड़ा जाता है।  
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- फोटो : Social Media
वहीं मकर संक्रांति पर दान का भी एक विशेष मह्त्व है। संक्रांति के दिन तिल का दान सबसे शुभ माना गया है, क्योंकि मान्यता है कि तिल शनि का द्रव्य है, तिल के जरिए इंसान अपने पूर्व जन्मों में किए गए पापों की माफी मांगता है। इस कारण लोग इस दिन काले और सफेद तिल का दान करते हैं। संक्रांति पर किया गया दान लोक-परलोक दोनों में ही सुख और समृद्धि प्रदान करता है। संक्रांति पर स्नान के बाद गुड़-तिल और मोटे अनाज के दान का बहुत महत्व है। साथ ही कंबल, ऊनी वस्त्र, जूते, भूमि, स्वर्ण और धार्मिक पुस्तकों का दान भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। आप अपनी श्रद्धा के अनुसार रामायण या गीता की पुस्तकों का दान दे सकते हैं। 
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मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों में स्नान के बाद नया जनेऊ धारण कर जरूरत मंद लोगों को भोजन अवश्य करना चाहिए और भोजन कराने के बाद कुछ चीज दान अवश्य करनी चाहिए। इससे आपके पूर्व जन्मों में किए गए पापों से मुक्ती मिल जाती है। कहा जाता है की इस दिन सूर्य का मकर में प्रवेश होने से ही सारे शुभ काम शुरु हो जाते हैं, क्योंकि खरमास समाप्त हो जाता है। जैसे बच्चों के मुंडन, छेदन संस्कार आदि। 
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