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दुनिया के 7 ऐसे देश, कोई कम तो कोई ज्यादा आबादी से है परेशान

Tue, 15 Dec 2020 09:01 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
मेडिकल जर्नल लैंसेट में छपे एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में फर्टिलिटी रेट में कमी हो रही है और इसका मतलब है कि इस सदी के अंत तक लगभग सारे देशों में जनसंख्या में कमी आएगी। लैंसेट की ये रिपोर्ट समाज पर इसके पड़ने वाले प्रभाव का भी जिक्र करती है। यहां पर हम सात देशों के बारे में जानेंगे, जो जनसंख्या में हो रहे नाटकीय बदलाव की समस्या से जूझ रहे हैं और इससे निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं।
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जापान का राष्ट्रीय झंडा - फोटो : सोशल मीडिया
जापान
लैंसेट में छपी रिपोर्ट के अनुसार इस सदी के आखिर तक जापान की जनसंख्या आधी हो जाएगी। 2017 की जनगणना के अनुसार जापान की जनसंख्या 12 करोड़ 80 लाख थी, लेकिन इस शताब्दी के आखिर तक ये घटकर पांच करोड़ 30 लाख तक होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

जनसंख्या के हिसाब से जापान दुनिया का सबसे बुजुर्ग देश है और 100 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की दर भी सबसे ज्यादा जापान में है। इस कारण जापान में काम करने की क्षमता रखने वालों की संख्या में लगातार कमी होती जा रही है और हालात के और ज्यादा खराब होनी की आशंका जताई जा रही है।

सरकारी अनुमान के अनुसार साल 2040 तक जापान में बुजुर्गों की आबादी 35 फीसदी से ज्यादा हो जाएगी। जापान में प्रजनन दर केवल 1.4 फीसदी है यानी जापान में एक महिला औसतन 1.4 बच्चे को जन्म देती है। इसक अर्थ ये हुआ कि काम करने योग्य लोगों की संख्या लगातार घटती जा रही है। किसी भी देश में उसकी मौजूदा जनसंख्या को बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि उस देश का प्रजनन दर 2.1 से कम ना हो।
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इटली का राष्ट्रीय झंडा - फोटो : सोशल मीडिया
इटली
इटली के बारे में भी अनुमान लगाया गया है कि 2100 तक वहां की आबादी आधी हो जाएगी। 2017 में इटली की आबादी छह करोड़ 10 लाख थी जो लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा सदी के आखिर तक घटकर दो करोड़ 80 लाख रह जाएगी। जापान की ही तरह इटली में बुजुर्गों की संख्या बहुत है। साल 2019 के विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार इटली में 23 फीसदी आबादी 65 साल से अधिक उम्र की है।

साल 2015 में इटली की सरकार ने प्रजनन दर बढ़ाने के लिए एक योजना शुरू की थी, जिसके तहत हर कपल को एक बच्चा होने पर सरकार की तरफ से 725 पाउंड यानी करीब 69 हजार रुपए दिए जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद इटली का प्रजनन दर पूरे यूरोपीय संघ में सबसे कम है। इटली में एक दूसरी समस्या प्रवासन की भी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल 2018 में एक लाख 57 हजार लोग इटली छोड़कर किसी और देश में चले गए थे।

इटली के कई शहरों ने स्थानीय आबादी को बढ़ाने और उनकी अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए अपनी-अपनी योजनाएं शुरू की हैं। लोगों को केवल एक यूरो में सरकार की तरफ से घर दिए गए और वहां रहने के लिए अलग से पैसे भी दिए जाते हैं अगर वो वहां कोई कारोबार शुरू करना चाहते हैं तो।

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चीन का नक्शा - फोटो : सोशल मीडिया
चीन
चीन ने 1979 में अपने यहां एक बच्चे की योजना शुरू की थी। चीन ने अपने यहां बढ़ती आबादी और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले उसके प्रभाव को देखते हुए 'वन चाइल्ड' की योजना शुरू की थी। लेकिन दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला ये देश आज जन्म-दर में हो रही अत्यधिक कमी से जूझ रहा है।

लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार अगले चार साल में चीन की आबादी एक अरब 40 करोड़ हो जाएगी लेकिन सदी के आखिर तक चीन की आबादी घटकर करीब 73 करोड़ हो जाएगी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल 2019 में देखा गया था कि पिछले 70 सालों में चीन की जन्म दर सबसे निचले स्तर पर आ गई है। कुछ लोगों को इस बात की आशंका है कि चीन एक 'डेमोग्राफिक टाइम बॉम्ब' बन गया है, जिसका आसान शब्दों में मतलब है कि काम करने वालों की संख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है और उन पर अपने बड़े और रिटायर्ड हो रहे परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी बढ़ती जा रही है।

चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में से एक है, इसलिए चीन का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। चीन में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी से चिंतित होकर सरकार ने साल 2015 में एक बच्चे की नीति बंद कर दी और कपल को दो बच्चे पैदा करने की इजाजत दे दी। इससे जन्म-दर में तो थोड़ा इजाफा हुआ लेकिन लंबे समय में ये योजना बढ़ती बुजुर्ग आबादी को रोकने में पूरी तरह सफल नहीं हो सकी।
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ईरान का राष्ट्रीय झंडा - फोटो : सोशल मीडिया
ईरान
अनुमान है कि ईरान की आबादी भी सदी के आखिर तक काफी कम हो जाएगी। 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद वहां की जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई थी लेकिन ईरान ने जल्द ही अपने यहां बहुत ही प्रभावी जनसंख्या नियंत्रण नीति लागू कर दी। पिछले महीने ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेतावनी दी थी कि ईरान में सालाना जनसंख्या वृद्धि दर एक फीसदी से भी कम हो गई है। मंत्रालय के अनुसार अगर इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई तो अगले 30 सालों में ईरान दुनिया के सबसे बुजुर्ग देशों में एक हो जाएगा।

सरकारी न्यूज एजेंसी इरना की रिपोर्ट के अनुसार ईरान में लोग शादी कम कर रहे हैं और जो शादी-शुदा हैं उनके यहां भी बच्चों के जन्म में कमी देखी जा रही है। समाचार एजेंसी के अनुसार आर्थिक परेशानी के कारण लोग ऐसा कर रहे हैं। पिछले महीने ईरान ने अपनी जनसंख्या बढ़ाने के लिए फैसला किया कि सरकारी अस्पतालों और मेडिकल केंद्रों में पुरुषों की नसबंदी नहीं की जाएगी और गर्भनिरोधक दवाएं भी सिर्फ उन्हीं महिलाओं को दी जाएंगी, जिनको स्वास्थ्य कारणों से उन्हें लेना जरूरी होगा।
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ब्राजील का राष्ट्रीय झंडा - फोटो : सोशल मीडिया
ब्राजील
ब्राजील में पिछले 40 वर्षों में प्रजनन दर में काफी कमी देखी गई है। 1960 में ब्राजील में प्रजनन दर 6.3 थी जो हाल के दिनों में घटकर केवल 1.7 रह गई है। लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार ब्राजील की आबादी 2017 में 21 करोड़ थी जो 2100 में घटकर 16 करोड़ के करीब हो जाएगी। 2012 के एक अध्ययन के अनुसार ज्यादातर टीवी धारावाहिकों में छोटे परिवार को ही दिखाया गया जिसका असर लोगों पर पड़ा और वहां जन्म-दर में कमी आती चली गई।

ब्राजील में जन्म-दर में लगातार कमी आ रही है लेकिन वहां किशोरों में बढ़ती प्रेगनेंसी एक नई समस्या बनकर उभर रही है। इसपर काबू पाने के लिए सरकार ने एक कैंपेन शुरू किया है, जिसका टैगलाइन है, 'किशोरावस्था पहले, गर्भावस्था बाद में'

ब्राजील की महिला, "परिवार और मानवाधिकार मामलों की मंत्री डैमारेस एलवेस ने इस साल के शुरू में बीबीसी से कहा था, "हमें किशोरों में बढ़ती प्रेगनेंसी को कम करना होगा। हममें ये कहने की हिम्मत थी कि हम शारीरिक संबंधों को देर से शुरू करने के बारे में बात करेंगे।"
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
भारत
भारत साल 2100 तक चीन को पीछे करते हुए दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएगा। हालांकि लैंसेट के शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत की आबादी में कमी आएगी और इस सदी के आखिर तक भारत की आबादी एक अरब 10 करोड़ हो जाएगी।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी अभी एक अरब 30 करोड़ है। 1960 में भारत में जन्म-दर 5.91 था जो अभी घटकर 2.24 हो गया है। दूसरे देश अपने यहां प्रजनन दर बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां लोगों से छोटे परिवार रखने की अपील की है।

पिछले साल एक भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, "जनसंख्या विस्फोट भविष्य में हमारे लिए कई तरह की समस्या पैदा करेगा। लेकिन एक ऐसा वर्ग भी है जो बच्चे को इस दुनिया में लाने से पहले नहीं सोचता है कि क्या वो बच्चे के साथ न्याय कर सकते हैं, उसे जो चाहिए क्या वो उसे सबकुछ दे सकते हैं।"
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नाइजीरिया का राष्ट्रीय झंडा - फोटो : सोशल मीडिया
नाइजीरिया
लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार साल 2100 तक सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में बसे अफ्रीकी देशों की जनसंख्या तीन गुना बढ़कर करीब तीन अरब हो जाएगी। इस रिपोर्ट के अनुसार इस सदी के आखिर तक नाइजीरिया की आबादी करीब 80 करोड़ हो जाएगी और जनसंख्या के कारण वो दुनिया का दूसरे सबसे बड़ा देश हो जाएगा।

रिपोर्ट ये भी कहती है कि उस वक्त तक नाइजीरिया में काम करने योग्य एक बड़ी संख्या हो जाएगी और उनकी जीडीपी में भी बहुत वृद्धि होगी। लेकिन बढ़ती जनसंख्या के कारण इसका बोझ देश के आधारभूत ढांचों और सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ रहा है। नाइजीरिया के अधिकारी अब इस बारे में खुलकर बोलने लगे हैं कि जनसंख्या को कम करने के लिए कदम उठाए जाने की जरूरत है।

साल 2018 में बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में वहां की वित्त मंत्री जैनब अहमद ने कहा था कि देश की जन्म-दर के बारे में विचार विमर्श की जरूरत है, जो दुनिया में सबसे अधिक दरों में से एक है।

जैनब का कहना था, "हमारे यहां ऐसे कई परिवार हैं, जो अपने बच्चों को खाना भी नहीं खिला सकते हैं, आप अच्छी स्वास्थ्य सेवा और बेहतर शिक्षा की तो बात ही मत करिए। इसलिए हमें इस बारे में बात करनी चाहिए।"
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