Automobile Industry
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असली समस्या: सिस्टम की धीमी रफ्तार
वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप के मैनेजिंग पार्टनर रविंद्र पाटकी के अनुसार यह सिर्फ टाइमलाइन का मामला नहीं है, बल्कि सिस्टम की कमी है। उनके सर्वे में करीब 80 प्रतिशत लोगों ने माना कि देरी बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक कारणों से होती है। यानी पूरी प्रक्रिया ही कंपनियों को धीमा बना रही है।
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ज्यादा प्रोजेक्ट्स, कम संसाधन
भारतीय ऑटो कंपनियां एक साथ कई प्रोजेक्ट्स लॉन्च करने की कोशिश करती हैं, ताकि कुछ तो टाइम पर पूरा हो जाएं। लेकिन इस वजह से संसाधनों का बंटवारा हो जाता है, काम धीमा पड़ता है और अधूरी तैयारी वाली गाड़ियां जल्दी से अगले चरण में धकेल दी जाती हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि डिजाइन लेवल पर जो बदलाव होने चाहिए, वो प्रोडक्शन या लॉन्च के बाद तक लटक जाते हैं। इससे वारंटी कॉस्ट बढ़ती है, मैनपावर और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) बजट बर्बाद होता है।
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