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Auto Industry: चीनी ईवी दबदबे के बीच भारतीय ऑटो उद्योग की असली परीक्षा, क्या हैं जरूरी सबक

Tue, 30 Sep 2025 02:58 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भारतीय वाहन निर्माता सिकुड़ते उत्पाद चक्र, देरी से लॉन्च और चीन के बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रभुत्व का सामना कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि भारतीय वाहन उद्योग के लिए प्रतिस्पर्धी बने रहने हेतु कार्यान्वयन संबंधी कमियों को दूर करना और नवाचार में तेजी लाना बेहद जरूरी है।
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Automobile Industry - फोटो : Freepik
भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री इस समय एक अजीब स्थिति में है। एक तरफ गाड़ियों का लाइफ साइकिल बहुत छोटा हो गया है। जहां कभी मारुति 800 दो दशक तक बिकी थी, वहीं अब हर दो साल में नए मॉडल और अपग्रेड आ जाते हैं। ग्राहक लगातार नए फीचर्स, फेसलिफ्ट और एडवांस टेक्नोलॉजी की मांग कर रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि भारतीय कंपनियों को एक नई गाड़ी को कंसेप्ट से मार्केट तक लाने में 3 से 5 साल लग जाते हैं। जबकि चीन की कंपनियां जैसे BYD (बीवाईडी) यह काम आधे समय में कर लेती हैं।

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Automobile Industry - फोटो : PTI
असली समस्या: सिस्टम की धीमी रफ्तार
वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप के मैनेजिंग पार्टनर रविंद्र पाटकी के अनुसार यह सिर्फ टाइमलाइन का मामला नहीं है, बल्कि सिस्टम की कमी है। उनके सर्वे में करीब 80 प्रतिशत लोगों ने माना कि देरी बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक कारणों से होती है। यानी पूरी प्रक्रिया ही कंपनियों को धीमा बना रही है। 

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ज्यादा प्रोजेक्ट्स, कम संसाधन
भारतीय ऑटो कंपनियां एक साथ कई प्रोजेक्ट्स लॉन्च करने की कोशिश करती हैं, ताकि कुछ तो टाइम पर पूरा हो जाएं। लेकिन इस वजह से संसाधनों का बंटवारा हो जाता है, काम धीमा पड़ता है और अधूरी तैयारी वाली गाड़ियां जल्दी से अगले चरण में धकेल दी जाती हैं।

इसका नतीजा यह होता है कि डिजाइन लेवल पर जो बदलाव होने चाहिए, वो प्रोडक्शन या लॉन्च के बाद तक लटक जाते हैं। इससे वारंटी कॉस्ट बढ़ती है, मैनपावर और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) बजट बर्बाद होता है।

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Automobile Industry - फोटो : Freepik
चीन से सबक लेने की जरूरत
पाटकी का मानना है कि समस्या सिर्फ रफ्तार की नहीं, बल्कि नवाचार (इनोवेशन) की भी है। चीन की कंपनियां अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा आरएंडडी में लगाकर नई टेक्नोलॉजी और पेटेंटेड डिजाइन बना रही हैं। इससे उनकी पकड़ मजबूत होती है और वे दुनिया भर के बाजार में अपनी शर्तों पर सौदा करती हैं।

इसके उलट, अगर भारतीय कंपनियां सिर्फ कॉपी-पेस्ट सप्लायर बनी रहीं, तो वे हमेशा राजनीतिक बदलावों और मार्केट रिस्क के सामने कमजोर रहेंगी। 

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Automobile Industry - फोटो : Volkswagen
असली इनोवेशन के लिए संसाधन बचाना होगा
आज उद्योग का सबसे बड़ा जाल यही है कि एक साथ बहुत सारे प्रोजेक्ट्स में पैसा और समय फंस जाता है, जिससे असली शोध और नवाचार पीछे छूट जाता है। वेक्टर कंसल्टिंग ने एक टू-व्हीलर कंपनी के साथ काम करके दिखाया कि अगर प्रोजेक्ट वर्कफ्लो को सही तरीके से प्लान किया जाए, तो बिना अतिरिक्त मानव संसाधन (मैनपावर) के उत्पादकता 5 गुना बढ़ सकती है। 

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टेक्नोलॉजी पर दांव और चीन की चिंता
भारत इस समय ईवी, हाइब्रिड, सीएनजी, हाइड्रोजन और बायोफ्यूल - सब पर एक साथ दांव खेल रहा है। लेकिन असली खतरा है रेयर अर्थ मैग्नेट्स और लिथियम-आयन सेल्स के लिए चीन पर निर्भरता।

चूंकि भारत में रेयर अर्थ माइनिंग पर्यावरण और राजनीतिक चुनौतियों से घिरी हुई है, पाटकी सलाह देते हैं कि हमें मैग्नेट-लेस मोटर्स और वैकल्पिक टेक्नोलॉजी पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

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Automobile Industry - फोटो : Freepik
चिप्स और सॉफ्टवेयर: अगला बड़ा मोर्चा
भारत के पास मिनरल बेस तो है, लेकिन सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम अभी कमजोर है। पाटकी मानते हैं कि बड़े ग्लोबल खिलाड़ियों को सीधे चुनौती देना मुश्किल होगा। लेकिन भारत नई टेक्नोलॉजी जैसे हाइड्रोजन और एडवांस बायोफ्यूल्स में तेजी से जगह बना सकता है।

सरकार अगर आयात कम करके बचाए गए पैसे को सेमीकंडक्टर और चिप मैन्युफैक्चरिंग में लगाए, तो भारत को लंबी रेस में फायदा होगा।

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Car Export - फोटो : Nissan
निर्यात और मजबूती की चुनौती
अमेरिका की टैरिफ नीति भारत के करीब 6 अरब डॉलर के ऑटो कंपोनेंट निर्यात पर असर डाल सकती है। हालांकि इसका सिर्फ एक चौथाई हिस्सा ही तुरंत जोखिम में है, क्योंकि बाकी ज्यादातर प्रोप्राइटरी या सिंगल-सोर्स सप्लाई है।

लेकिन संदेश साफ है- सिर्फ लो-कॉस्ट मैन्युफैक्चरिंग से काम नहीं चलेगा। टेक्नोलॉजी से जुड़ी इंडस्ट्री को बदलना मुश्किल होता है, और भारत को यही रास्ता अपनाना होगा।

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Automobile Industry - फोटो : Adobe Stock
कम लेकिन बेहतर प्रोजेक्ट्स
भारतीय ऑटो इंडस्ट्री के सामने वक्त बहुत अहम है। छोटे प्रोडक्ट साइकिल, महंगी टेक्नोलॉजी और बढ़ते भूराजनीतिक जोखिम एक साथ उद्योग को नई दिशा की मांग कर रहे हैं। साफ है कि भारत को कम लेकिन क्वालिटी प्रोजेक्ट्स, ज्यादा आरएंडडी निवेश और पेटेंटेड टेक्नोलॉजी पर ध्यान केंद्रित करना होगा। ताकि वह चीन जैसी ताकतों का मुकाबला कर सके। 

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