मनुष्य के जीवन में भारी उतार-चढ़ाव लाने वाले ‘कालसर्प योग’की छाया नए संवत्सर के आरंभ से ही पड़ रही है।‘प्रमादी’नामक नए संवत्सर के शुभारम्भ से ही राहु और केतु के द्वारा बनने वाले कालसर्प योग की छाया पड़ना देश और देश की जनता के लिए शुभ नहीं है क्योंकि, स्वतंत्र भारत की वृषभ लग्न की जन्मकुंडली में यह योग 'कुलिक' कालसर्प योग के रूप में असर दिखाएगा। जो देश में साम्प्रदायिकता बढ़ा सकता है और स्वतंत्र भारत की ही प्रभाव राशि कर्क के बारहवें भाव में 'शेषनाग' कालसर्प योग के रूप में भी देश के लिए शुभ नहीं रहेगा क्योंकि, यह योग देश अथवा व्यक्ति को आर्थिक रूप से कमजोर बनाता है।
इस योग का नैसर्गिक प्रभाव यह भी है कि यदि यह योग शुभ है तो व्यक्ति को जीवन के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाता है और अशुभ है तो व्यक्ति को अर्श से फर्श पर भी ला खड़ा करता है। भारतवर्ष के ही नहीं वरन संसार के कई राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित अनेकों महान नेता, उद्योगपति, फ़िल्मी कलाकार लेखक आदि इसी योग के शुभ प्रभाव से अपने जीवन में महानतम मापदंडों को स्थापित किया है और कई बड़ी शख्सियतें इस योग के कुप्रभाव से समय आने पर जमींदोज भी हुई हैं।