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साध्वी के बोल

Thu, 04 Dec 2014 12:27 AM IST
अमर उजाला, दिल्ली
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से अपने पहले भाषण में जातिगत और सांप्रदायिक तनाव पर दस वर्ष तक की रोक लगाने का आह्वान किया था। मगर उसके बाद से भाजपा के कई सांसदों और नेताओं के भड़काने वाले बयान आ चुके हैं।
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दिल्ली की एक राजनीतिक सभा में केंद्रीय राज्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति का विवादास्पद बयान इसकी ताजा कड़ी है। पहली बार लोकसभा पहुंची साध्वी कथा वाचन के लिए जानी जाती रही हैं, और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वह मर्यादित व्यवहार करें। बेशक, उन्होंने संसद के दोनों सदनों में अपने विवादास्पद बयान पर खेद जताया है, लेकिन इससे पहले जब उनसे इस बयान के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने एक और भड़काने वाला बयान ही दिया था। चूंकि दिल्ली में चुनाव होने हैं, इसलिए उनके इस विवादास्पद बयान को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। दरअसल इससे पहले उत्तर प्रदेश में विधानसभा के उपचुनाव के समय भी कथित लव जिहाद के मुद्दे को इसी तरह हवा दी गई थी।

सरकार भले ही यह कह सकती है कि विपक्ष के पास चूंकि मोदी सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए वह इसे तूल दे रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को इस बात पर जरूर विचार करना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है कि उनकी हिदायतों को उनके ही मंत्री या सांसद नजरंदाज कर रहे हैं।
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अपने छह महीने के कार्यकाल में मोदी लगातार विकास और सुशासन के मुद्दे पर बात जरूर कर रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर संघ परिवार से जुड़े कुछ संगठन और नेता किसी न किसी तरह हिंदुत्व के मुद्दे को केंद्र में लाना चाहते हैं। संभवतः इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यह वर्ग 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा को मिली सफलता को हिंदुत्व की जीत के रूप में देख रहा है और उसे ऐसा लगता है कि यही सही समय है, जब संघ परिवार के एजेंडे पर अमल किया जा सकता है।

भाजपा और संघ परिवार इसे स्वीकार करें या न करें, लेकिन यह एक सांविधानिक सच है कि धर्मनिरपेक्षता इस देश की रीढ़ है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश के सांप्रदायिक ताने-बाने को कोई नुक्सान न पहुंचाए, फिर वह सरकार में कोई मंत्री ही क्यों न हो।
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