फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कमजोर जमीन पर

Wed, 18 Mar 2015 11:33 PM IST
नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधान में जो व्यापक बदलाव किए थे, वही अब इसे पारित कराने की राह में बड़ी बाधा बन रहे हैं, और इस प्रक्रिया में खुद सरकार की छवि दांव पर लगी है।
विज्ञापन


भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को आगामी पांच अप्रैल तक संसद के दोनों सदनों से पारित कराना है, पर लोकसभा में संख्याबल के कारण पास हो जाने के बावजूद राज्यसभा में मौजूदा स्वरूप में और मौजूदा सत्र में इसका पारित हो पाना असंभव लगता है। तब तो और भी, जब इसके खिलाफ चौदह राजनीतिक पार्टियों ने एकजुट होकर राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया। बजट सत्र के पहले हिस्से की अवधि थोड़ी बढ़ाकर कोयला और खदान व खनिज विधेयकों को पारित कराने में सरकार भले सफल हो जाए, पर लगता नहीं है कि इस दौरान भूमि अधिग्रहण के मामले में राज्यसभा में उसे सफलता मिलने वाली है।

ऐसे में, सरकार को नए सिरे से अध्यादेश लाना पड़ेगा, वह भी तब, जब संसद का सत्र न चल रहा हो। पर उसका पारित होना भी इस पर निर्भर करेगा कि उसमें विपक्ष की आपत्तियों को दूर करने में सरकार कितनी सफल होती है। भूमि अधिग्रहण पर पैदा गतिरोध की दो मुख्य वजहें हैं। एक तो मौजूदा सरकार ने प्रस्तावित जमीन अधिग्रहण कानून में जो प्रावधान किए हैं, वे किसान-विरोधी और उद्योग-हितैषी मालूम होते हैं। मसलन, जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में किसानों की सहमति को बहुत महत्व नहीं दिया गया है और सामाजिक सर्वे वगैरह प्रावधान भी खत्म कर दिए गए हैं। गतिरोध की दूसरी वजह खुद सरकार का रवैया है।
विज्ञापन


बेशक इतने कम समय में भूमि अधिग्रहण विधेयक को प्रवर समिति में भेजने का कोई लाभ नहीं था। पर इसके कुछ प्रावधानों को बदलने का संकेत देने के बावजूद सरकार ने यह साफ नहीं किया है कि वह भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों को किसानों के हित में करने जा रही है या नहीं। लोकसभा में मजबूत संख्याबल से उत्साहित सरकार उन तमाम विधेयकों को जल्दी पारित कराना चाहती है, जिनसे आर्थिक विकास को गति मिल सकती है। पर लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की अनदेखी नहीं की जा सकती, जो खासकर भूमि अधिग्रहण के मौजूदा प्रावधानों को किसान-विरोधी बताते हुए इनमें बदलाव लाने की जिद पर अड़ा है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें