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जया, ममता, माया और सुषमा

Fri, 07 Mar 2014 07:54 PM IST
नई दिल्ली
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महिलाओं को विधायिका में एक तिहाई आरक्षण देने का मुद्दा सिरे नहीं चढ़ रहा है, मगर आगामी लोकसभा चुनाव में विभिन्न पार्टियों की नेत्रियां अहम भूमिका निभाने जा रही हैं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता को ही देखिए, जिन्होंने गठबंधन से लेफ्ट पार्टियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है।
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इससे तीसरे मोर्चे को तो मोरचा लग ही गया है, वाम दलों के लिए इससे अधिक शर्मिंदगी क्या हो सकती है कि जिन जयललिता को वह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बता रहे थे, वह पश्चिम बंगाल में उन्हें सत्ता से बेदखल करने वाली ममता बनर्जी से हाथ मिलाने को तैयार हैं! ममता ने कहा है कि उन्हें जयललिता के प्रधानमंत्री बनने और उनके साथ काम करने पर ऐतराज नहीं है।

इन दो के अलावा बसपा सुप्रीमो मायावती भी पीछे नहीं हैं, वह तो बहुजन के हित में प्रधानमंत्री पद पर पहले ही दावा ठोंक चुकी हैं, आखिर पिछले लोकसभा चुनाव में माकपा सुप्रीमो ने ही उन्हें इस पद के योग्य बताया था। मगर यह भी तो हो सकता है कि मायावती भी जया और ममता से हाथ मिला लें। ऐसा हुआ, तो मामला वाकई बहुत दिलचस्प हो जाएगा, क्योंकि ये तीनों जिन राज्यों से आती हैं, वहां लोकसभा की कुल 161 सीटें हैं।
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भाजपा में नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह युग के सूत्रपात के बाद बेशक सुषमा स्वराज कुछ अनमना महसूस कर रही हों, मगर एक समय उन्हें भी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार माना जाता था। दिवंगत बाला साहेब ठाकरे ने तो यहां तक कहा था कि उनमें देश का नेतृत्व करने की क्षमता है। श्रीरामुलु रेड्डी के भाजपा में और विनोद शर्मा के सहयोगी दल हरियाणा जनहित कांग्रेस में शामिल होने का विरोध कर उन्होंने जताया है कि पार्टी में सिर्फ चुनाव की वजह से किसी भी तरह की मनमानी नहीं चल सकती।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तो 2004 में ही प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया था, मगर पार्टी के पास मीरा कुमार जैसी नेत्री भी हैं, जिनके बारे में अटकलें चल ही रही थीं कि वह मनमोहन सिंह की जगह ले सकती हैं। इंदिरा गांधी के रूप में देश को एकमात्र महिला प्रधानमंत्री मिली। आज देश की करीब आधी आबादी महिलाओं की है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि तमाम राजनीतिक पार्टियां आखिर कितनी महिलाओं को लोकसभा का टिकट देती हैं।
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