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कश्मीरी पंडितों की घर वापसी

Fri, 10 Apr 2015 08:36 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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कश्मीर में सीमापार आतंकवाद ने जिस एक समुदाय का सर्वाधिक नुकसान किया है, वे कश्मीरी पंडित हैं, इसलिए इनकी घर वापसी की पहल का स्वागत होना चाहिए। पिछले ढाई दशकों में अपनी जमीन से बेदखल हुए लगभग 62,000 कश्मीरी पंडित परिवारों में से एक बड़ी आबादी को राहत शिविरों और दड़बेनुमा घरों में जिस मजबूरी में रहना पड़ रहा है, वह मानवता को शर्मसार करने वाला है।
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घाटी में चुनावी प्रक्रिया को सर्वस्वीकार्य बनाकर तथा इसे रेल नेटवर्क के जरिये पूरे देश से जोड़कर हमारी सरकारों ने कश्मीर में विकास के प्रति जिस तरह प्रतिबद्धता दिखाई है, कश्मीरी पंडितों को उनके घरों में ले आना उस दिशा में अगला कदम होगा। उन्हें उनके घरों में लौटाना पाकिस्तान और अलगाववादियों की मंशा को भी करारा जवाब होगा। केंद्र ने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी को अपने एजेंडे में रखकर, और राज्य की पीडीपी-भाजपा सरकार ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में इस पर जोर देकर वाकई जरूरी पहलकदमी का संदेश दिया है।

पर इस मुद्दे पर भाजपा और पीडीपी के बीच अब जो मतभेद दिख रहे हैं, वे दुर्भाग्यपूर्ण हैं। बेशक इसके लिए मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ज्यादा जिम्मेदार हैं, जिन्होंने पहले कश्मीरी पंडितों के लिए अलग टाउनशिप के भाजपा के प्रस्ताव पर हामी भरी, बाद में इसका विरोध होने पर मुकर गए। पर इस मामले में भाजपा का रुख भी व्यावहारिक नहीं। अव्वल तो एक आबादी को स्थानीय संस्कृति से काटकर अलग-थलग बसाना समझदारी नहीं है, तिस पर भाजपा उस कश्मीर में ऐसा जोखिम उठाने के बारे में सोच रही है, जो मजहबी आधार पर ध्रुवीकृत है। वहां ऐसा कदम आग से खेलने जैसा होगा।
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इससे इन्कार नहीं कि समुचित सुरक्षा के अभाव में ही उनकी घर वापसी की पहले की योजनाएं परवान नहीं चढ़ सकीं। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि कश्मीरी पंडितों को उसी स्वाभाविक परिवेश में लौटाया जाए, जिसमें वे अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ रहते थे। भाजपा इस संदर्भ में अपने पू्र्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को याद कर सकती है, जिन्होंने कश्मीर में इन्सानियत की बहाली को सबसे आवश्यक बताया था।
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