प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपनी सरकार की प्राथमिकताएं तय करने से स्पष्ट है कि उनका जोर सुशासन पर है और इसमें वह कोई अड़चन नहीं चाहते। अपने दस सूत्रीय एजेंडे में उन्होंने जिन मुद्दों पर जोर दिया है, उनमें राज्यों से जुड़े मुद्दे काफी अहम हैं।
असल में साढ़े बारह वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि केंद्र और राज्य के बीच जब तक बेहतर समन्वय न हो, सरकारी नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों पर निचले स्तर तक ठीक से अमल नहीं किया जा सकता। वास्तव में राज्यों को विकास का इंजन तभी बनाया जा सकता है, जब उन्हें केंद्र से पूरा सहयोग मिले।
हालांकि राज्यों पर जोर देने की बड़ी वजह भूमि अधिग्रहण के कारण लटकी परियोजनाएं भी हो सकती हैं, जिनके कारण निवेश अटके हुए हैं। दरअसल इसे लेकर केंद्र और राज्य के बीच तनातनी की वजह यह भी है कि जमीन राज्य का मामला है, पर जमीन अधिग्रहण समवर्ती सूची में शामिल है।
मोरगन स्टैनली जैसी वित्तीय संस्था का कहना है कि निवेशकों की नजर इस पर है कि मोदी सरकार बजट में जमीन अधिग्रहण और राज्यों को बिजली दिए जाने के साथ ही करों में किस तरह का सुधार करती है। नए प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी प्राथमिकता में रखा है; इन मामलों में भी राज्यों की भूमिका अहम होगी।
मोदी सुशासन के साथ ही मजबूत अर्थव्यवस्था चाहते हैं, जिसके लिए नए निवेश की जरूरत होगी। मगर मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मामला उनकी सरकार के लिए कुछ परेशानी खड़ा कर सकता है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में इसका विरोध किया था। लेकिन अभी अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे भारत के व्यापारिक सहयोगियों की नजर इस बात पर है कि क्या मोदी यूपीए सरकार के इस नीतिगत फैसले को पलट देगी!
लगता है कि पिछली सरकार की गलतियों से सबक लेकर ही मोदी ने प्राकृतिक संपदा की ई-नीलामी और नौकरशाही पर भरोसे जैसे कदमों को प्राथमिकता में रखा है। उन्होंने मंत्रियों को शुरुआती सौ दिन की प्राथमिकताएं करने के निर्देश दिए हैं, जिससे लगता है कि उन्हें इस बात का एहसास है कि बहुमत से जिताने वाले लोग उनसे जल्द ही हिसाब भी मांग सकते हैं।