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अशांत गाजा

Thu, 17 Jul 2014 07:57 PM IST
नई दिल्ली
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इस्राइल और फलस्तीन एक बार फिर उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां से आगे का रास्ता साफ दिखाई नहीं दे रहा है। वहां के हालात पर अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री पी जे क्राउले की यह टिप्पणी गौर करने लायक है, 'मुश्किलें अक्सर अवसर लेकर आती हैं, लेकिन यहां ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है।'
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हमास के हमले में तीन इस्राइली किशोरों के मारे जाने के बाद इस्राइल ने गाजा में हवाई हमले कर तबाही मचा दी है। दस दिन के भीतर गाजा में दो सौ से अधिक लोग मारे गए हैं, जिनमें अधिकांश नागरिक हैं। कहने को वहां 2012 से संघर्ष विराम की स्थिति थी, लेकिन हकीकत यह है कि वहां राख के नीचे दबी आग को थोड़ी-सी हवा की जरूरत थी। इस्राइल अपना कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है, और फलस्तीन अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है। दोनों पक्ष जिस तरह की जिद पाले हुए हैं, उसमें जल्दी कोई समाधान होता नहीं दिख रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हुए कुछ घंटे के संघर्ष विराम में अलबत्ता लोगों को थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन वहां हिंसा रोकने की ठोस पहल की जरूरत है। मिस्र ने अपनी ओर से संघर्ष विराम की पहल जरूर की है, लेकिन उसकी निष्पक्षता पर इसलिए संदेह है, क्योंकि वहां का सैन्य समर्थित प्रशासन हमास का विरोधी है और उसे मुस्लिम ब्रदरहुड के सहयोगी के तौर पर देखता है। असल में पिछली बार जब संघर्ष विराम हुआ था, तब मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता मोहम्मद मोरसी ने पहल की थी, मगर अब वह जेल में हैं!
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इसके अलावा हमास को अमेरिका और यूरोपीय संघ ने आतंकी संगठन घोषित कर रखा है, ऐसे में उसके साथ बराबरी की बातचीत संभव नहीं दिखती। वहां के हालात विकट हैं, जिसमें आम नागरिकों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। हवाई हमलों और नाकेबंदी के कारण उन्हें रोजमर्रा की जरूरत का सामान जुटाने में खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

जहां तक भारत की बात है, तो उसके इस्राइल और फलस्तीन, दोनों से ही पुराने रिश्ते हैं। इसके अलावा पश्चिम एशिया में हजारों भारतीय रहते हैं और वह हमारे लिए तेल का भी बड़ा जरिया है, ऐसे में वहां किसी भी तरह की अस्थिरता भारत के हित में नहीं है। जाहिर है, भारत वहां के हालात को नजरंदाज नहीं कर सकता। इसे राजनीतिक टकराव का मुद्दा बनाने के बजाय देश के हितों को ध्यान में रखकर इस पर विचार करने की जरूरत है।
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