भारत जैसे देश में महान उद्देश्यों और महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों को भ्रष्टाचार किस तरह दीमक की तरह खोखला कर देता है, कपार्ट इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिसे अब सरकार ने बंद करने का फैसला लिया है। वर्ष 1986 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में ग्रामीण भारत में दलितों, पिछड़ों, शारीरिक रूप से निःशक्तों, महिलाओं और बच्चों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए जो योजना बनी थी, उसे मूर्त रूप देने के लिए कपार्ट का गठन हुआ था।
अब करीब सत्ताईस वर्षों के बाद इसकी उपलब्धियों का लेखाजोखा करने बैठते हैं, तो निराशा ही हाथ लगती है। यह तो पता नहीं कि इस दौरान कुल एक हजार करोड़ रुपये से किन इलाकों में सामुदायिक गतिविधियां विकसित की गईं या हाशिये के लोगों को तकनीक और प्रौद्योगिकी से कितना लैस किया गया।
हां, इसके ब्योरे जरूर हैं कि आंध्र प्रदेश के कडप्पा और कोलार जिलों के कई फर्जी गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) ने सालों-साल दुर्गम इलाकों में हैंडपंप लगाने के नाम पर लाखों रुपये हजम किए या बिहार के मधुबनी का एक एनजीओ एक ही शैक्षिक परियोजना के नाम पर कई वर्षों तक भारी धनराशि ऐंठता रहा या ग्रामीण महिलाओं को अस्थायी रोजगार देने का वायदा कर ग्रांट हड़पने वाली एक संस्था का अस्तित्व सिर्फ कागज पर था!
कपार्ट के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से पहले इन संदिग्ध संस्थाओं को पैसे बांटे जाते थे, फिर शिकायत सामने आने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती थी! जिस कपार्ट पर ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने की जिम्मेदारी थी, वह वर्षों तक मंत्रियों और सचिवों की जेब भरता रहा। लेकिन तब भी कपार्ट को बंद करना समस्या का समाधान नहीं।
ताकतवरों की धूर्तता का खामियाजा वे लोग क्यों भुगतें, जो अब भी हाशिये पर हैं? शायद इसीलिए सरकार अब कपार्ट की जगह एक नई योजना ला रही है, जिसमें मंत्रियों और सचिवों की कोई भूमिका नहीं होगी। लेकिन इससे यह गारंटी कहां है कि नई योजना में भ्रष्टाचार का एक नया तंत्र पैदा नहीं होगा? सवाल यह भी है कि कपार्ट को इस हाल तक पहुंचाने वाले लोगों की शिनाख्त और उन्हें दंडित करने के बारे में सरकार ने क्या सोचा है।