रासायनिक खेती और ऑरगेनिक खेती में मृत और जीवित का अंतर है। रासायनिक खेती में रसायनों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरक शक्ति खत्म हो जाती है। भूजल स्तर नीचे गिर जाता है। फसलचक्र बदल जाता है और इस कारण किसान का रोजगार खत्म हो जाता है। ऐसी फसलें स्वास्थ्यवर्धक नहीं होती, इनसे शरीर को ताकत नहीं मिलती, कई बीमारियां होती हैं।
वरदान बन गई जैविक ताकत
दूसरी तरफ ऑरगेनिक खेती किसान और जमीन के लिए वरदान है। कम लागत होने के बावजूद धीरे-धीरे भूमि की उर्वरक शक्ति बढ़ती है, भूजल स्तर बढ़ता है और देसी बीजों को नया जीवन मिलता है। यही नहीं फसलचक्र नियमित होता है और किसान को रोजगार मिलता है। जैविक उत्पाद उपभोक्ता के लिए स्वास्थ्यवर्धक है।
सेहत के लिए वरदान
बतौर ग्राहक ऑगरेनिक अनाज आपके स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी फायदेमंद है। अच्छा स्वास्थ्य पाने के लिए अब लोग मोटे अनाज की ओर आकर्षित हुए हैं। इसमें फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है और इससे चयापचय की क्रिया तेज होती है। ऑगरेनिक अनाज की शुद्धता और स्वाद का कोई जो़ड नहीं है और यह अनाज पेट के रोगों के लिए खासा कारगर साबित हुआ है। वैसे ही मधुमेह के रोगियों के लिए भी मोटा अनाज फायदेमंद है।
अनाज कम लेकिन अनाज में दम
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते आ रहे हैं कि हरित क्रांति से उलट ऑरगेनिक खेती में अनाज की उपलब्धता कम होती है। जर्मनी के कृषि वैज्ञानिकों ने यह कहकर ऑरगेनिक खेती को माइनस प्वाइंट दिए हैं कि इस प्रक्रिया में अन्न कम उपजता है और दुनिया की बढ़ती अन्न जरूरतों को देखते हुए ऑरगेनिक खेती ज्यादा फायदेमंद नहीं। लेकिन दूसरी तरफ वैज्ञानिक ये भी स्वीकार करते हैं कि उच्च क्वालिटी का अन्न केवल ऑरगेनिक खेती के जरिए ही प्राप्त किया जा सकता है। यही नहीं अगर जमीन को भविष्य के लिए बचाकर रखना है तो ऑरगेनिक खेती ही एकमात्र विकल्प है।
क्या आपको लगता है कि कम अन्न उपजाने के बावजूद ऑरगेनिक खेती किसान और जमीन के हित में है। क्या ऑरगेनिक खेती को बढ़ावा देने से किसान का भला होगा?