भारत में महिलाओं की सेक्स से जुड़ी बीमारियों पर किए गए एक शोध के मुताबिक 77 फीसदी महिलाओं में कामेच्छा की कमी है। वहीं अमरीका में एक देशव्यापी शोध में ये दर करीब 33 फीसदी पाई गई।
हाल में एक अमरीकी कंपनी ने इस बीमारी से जूझ रही महिलाओं के लिए एक दवा, ऐड्डी, बनाई है जिसे महिलाओं का वायग्रा कहा जा रहा है। पर भारत के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय महिलाओं की सेक्स में कम दिलचस्पी की वजहें इतनी जटिल हैं कि ऐसी दवा उनकी ‘सेक्सुअल डिजायर’ वापस लाने में कारगर नहीं हो पाएगी।
कामेच्छा का मतलब ‘बदचलन’
सबसे पहली दिक्कत है बीमारी की कम समझ। कुछ इस वजह से कि आम तौर से महिलाओं की कामेच्छा के साथ शर्म और पवित्रता को जोड़ा जाता है और कुछ इसलिए कि सेक्स में महिलाओं के आनंद को अहमियत नहीं दी जाती। पिछले 33 साल से चेन्नई में सेक्स से जुड़ी बीमारियों के लिए क्लीनिक चला रहे सेक्सॉलोजिस्ट नारायण रेड्डी ने बताया कि उनके पास आनेवाल मरीजों में से सिर्फ पांच फीसदी महिलाएं खुद इस बीमारी की चर्चा करती हैं।
डॉ. रेड्डी ने कहा, “इसकी बड़ी वजह ये है कि जो महिलाएं में कामेच्छा की कमी की शिकायत करने की हिम्मत करती हैं, उनमें से ज्यादातर के पार्टनर फौरन ये कहते हैं कि इसका मतलब महिला के शादी से पहले कई रिश्ते थे, यानि वो महिला पर बदचलन होने का आरोप लगाते हैं।”
25 फीसदी मामले ऐसे होते हैं जब पति ये शिकायत लेकर आते हैं कि उनकी पत्नी की सेक्स में दिलचस्पी नहीं है और तब भी रवैया आरोप लगानेवाला ही होता है।‘ऑर्गैजम क्या है, नहीं जानतीं’ ऐसे में ऐड्डी क्या भारतीय महिलाओं की मदद कर सकती है? डॉ. रेड्डी के मुताबिक बहुत कम हद तक की ही।
वो कहते हैं, कि पुरुष दवा और सुंदर दिखनेवाली वस्तु या व्यक्ति से सुख हासिल कर सकते हैं पर महिलाओं की कामेच्छा सुंदर महसूस होनेवाले ख्यालों से बढ़ती है। यानि उनकी बीमारी का हल जितना उनके पास है उतना ही उनके पति/पार्टनर के पास भी।
डॉ. रेड्डी कहते हैं, “सिर्फ सेक्स के दौरान महिला को समय देना ही काफी नहीं है, अगर पुरुष आम जीवन में उसकी और उसके विचारों की इज्जत ना करे, आजादी से जीने ना दे, संवेदनशील ना हो या चोट पहुंचाए तो ये सब महिला की कामेच्छा को कम या खत्म कर सकता है।”
साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित उड़िया लेखिका सरोजिनी साहू महिलाओं की सेक्सुआलिटी पर कई किताबें लिख चुकीं हैं।
वो कहती हैं, “आप ये जानकर हैरान होंगी कि 10-12 बच्चे पैदा कर चुकी कई मां ये नहीं जानती कि ‘ऑर्गैजम’ क्या होता है। दवा चाहे खिला दें, पर जब तक सेक्स पर ‘टैबू’ रहेगा और ये सोचा जाएगा कि महिलाओं की कामेच्छा गलत है तब तक वो कुछ महसूस नहीं कर पाएंगी।”
महिलाओं की सेक्स में दिलचस्पी जिस्मानी बदलावों से भी कम हो सकती है। इसमें सबसे व्यापक है मेनोपॉज यानि करीब 45-50 की उम्र में आने के साथ मासिक धर्म के खत्म होने वाला समय।
‘इंडियन मोनोपॉज़ सोसाइटी’ की दिल्ली सचिव और आईवीएफ स्पेष्लिस्ट, डॉ एसएन बासु के मुताबिक गर्भवती होने से पहले और बच्चा पैदा होने के बाद का समय भी ऐसा होता है जब महिलाओं की सेक्स में दिलचस्पी कम हो जाती है।
लंबे समय तक गर्भ-निरोधक गोलियां खाने से, मिर्गी के इलाज के लिए दवा खाने या अवसाद की दवाएं लेने से भी कामेच्छा पर असर पड़ता है।
पर डॉ बासु के मुताबिक महिलाएं उनसे इसकी चर्चा नहीं करतीं, “महिलाएं मुझसे ये बात नहीं करतीं, ये बात पुरुष ही उठाते हैं। बल्कि वो तो मेनोपॉज के बाद बहुत खुश होती हैं, उनके लिए ये मासिक धर्म से आजादी होती है, सेक्स में दिलचस्पी की शिकायत वो नहीं करती।”
बेडरूम की दुनिया
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक भारत में 15 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाओं में से केवल 27 फीसदी कामकाजी हैं। ऐसे में कामेच्छा बढ़ाने वाली महंगी दवा लेने की आज़ादी और विकल्प बहुत कम के पास ही मौजूद है।
पर भारत के कई चर्चित जर्नल और किताबों में छपे, दक्षिण भारत के एक क्लिनिक के शोध ने ये साफ कर दिया कि वहां आनेवाली ज्यादातर महिलाएं कामेच्छा की कमी महसूस करती हैं।
ये एक इशारा है कि भारतीय महिलाएं यौन संबंध तो बना रही हैं पर उसमें उनकी दिलचस्पी नहीं है। बल्कि संभावना है कि ये बीमारी भारत में विकसित पश्चिमी देशों से कहीं ज्यादा व्यापक हो।
डॉ साहू कहती हैं, “हमारे देश में कामसूत्र जरूर लिखी गई, पर वो सेक्स की क्रियाओं के बारे में है। भारतीय संस्कृति में औरत की डिजायर और उस पर पुरुष के नियंत्रण का दर्जा समझने के लिए हमें अहिल्या के श्राप और सीता की अग्निपरीक्षा याद करनी होगी।”
जब तक औरत की कामेच्छा पुरुष की जरूरत के समान नहीं आंकी जाएगी, तब तक सेक्स और उसमें दिलचस्पी का असंतुलन बना रहेगा और दवाएं उसे कुछ ही हद तक ठीक कर पाएंगी।