राजनीतिक दलों की ओर से सोशल मीडिया पर चुनाव प्रचार कई शहरी सीटों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है।
उम्मीद जताई जा रही है कि सोशल नेट वर्किंग साइट पर राजनीतिक दलों के प्रचार अभियान के चलते खासतौर पर महानगरों और दूसरे दर्जे की शहरी लोकसभा सीटें बड़े पैमाने पर प्रभावित होंगी।
वहीं पहली दफा वोट डालने वाले युवाओं को प्रभावित करने में भी राजनीतिक दलों की सोशल नेट वर्किंग साइट काफी अहम हो सकती है। यही कारण है कि विभिन्न दलों ने इन सीटों पर मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए भारी भरकम बजट तय किया है।
30 फीसदी सीटों पर पड़ सकता है असर
डिजिटल मीडिया के विशेषज्ञों के मुताबिक लोकसभा चुनाव में करीब 30 फीसदी शहरी सीटें सोशल नेट वर्किंग साइट पर हो रहे प्रचार से प्रभावित हो सकती हैं।
यही कारण है कि वोटरों को लुभाने के लिए सोशल नेट वर्किंग साइट पर राजनीतिक पार्टियों के बीच घमासान मचा हुआ है। आनलाइन संवाद, वॉलेंटियर बनाने, पार्टी सदस्यता बढ़ाने में डिजिटल प्लेटफार्म का जमकर इस्तेमाल हो रहा है।
राजनीतिक दल अपने महत्वपूर्ण रैलियों के वीडियो, भाषण को भी अपलोड कर रहे हैं। जबकि ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा के लिए भी इसका जोर-शोर से इस्तेमाल हो रहा है।
500 करोड़ तक खर्च करेंगे राजनीतिक दल!
इंटरनेट और मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया का कहना है कि सोशल मीडिया पर बेहतर ढंग से प्रचार किए जाने से निश्चित तौर पर कुछ फीसदी वोट प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए डिजिटल माध्यम पर भारी भरकम खर्च होने का अनुमान भी जताया जा रहा है।
माना जा रहा है कि गूगल, फेसबुक और ट्वीटर जैसे बड़े नेट वर्किंग साइटों में आम चुनाव के प्रचार पर राजनीतिक दल करीब पांच सौ करोड़ रुपये तक खर्च कर सकते हैं।
देश में करीब बीस करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और दस करोड़ से ज्यादा लोग फेसबुक जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं। इनमें युवाओं की बड़ी फौज शामिल है। दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए आम आदमी पार्टी ने डिजिटल प्लेटफार्म का जमकर इस्तेमाल किया था।