दिल्ली के विधायकों-मंत्रियों के वेतन में हुए भारी इजाफे के बाद सांसदों और केन्द्रीय मंत्रियों के वेतन-भत्ते में बढोतरी को लेकर सुगबुगाहटों का दौर शुरू हो गया है। मगर बढ़ोतरी को लेकर होनेवाली आलोचनाओं को लेकर सतर्क केन्द्र सरकार में अब मंत्रियों-सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने के लिए केन्द्रीय कर्मियों की तरह नया स्थाई फार्मूला निकालने पर विचार होने लगा है।
सरकार के अंदर हो रही चर्चाओं में प्रधानमंत्री का वेतन कैबिनेट सचिव के वेतन से 10 हजार ज्यादा, कैबिनेट मंत्रियों का कैबिनेट सचिव से 8 हजार अधिक तो राज्य मंत्रियों का कैबिनेट सचिव से 5 हजार ज्यादा करने का सुझाव आया है। वहीं सांसदों का वेतन केन्द्र सरकार के सचिव के वेतन से एक हजार रुपए ज्यादा करने का सुझाव है।
इन सुझावों के साथ माननीयों के वेतन में केन्द्रीय कर्मियों की तरह सालाना 10 से 12 फीसदी वृद्धि का स्थाई फार्मूला लागू करने के प्रस्ताव पर भी सरकार में गौर किया जा रहा है। ताकि माननीयों के वेतन बढ़ोत्तरी के सवाल पर राजनीतिज्ञों को बार-बार देश भर की आलोचनाओं की बाढ़ न झेलनी पड़े।
अगले बजट सत्र में आ सकता है प्रस्ताव
सरकार के एक उच्चपदस्थ सूत्र ने कहा कि दिल्ली के विधायकों के
वेतन-भत्ते में वृद्धि के बाद सांसदों के वेतन बढ़ाने का मामला अगले बजट
सत्र में आ सकता है। सांसदों के वेतन भत्ते में आखिरी बार बढ़ोतरी अगस्त
2010 में हुई थी और अब इसमें इजाफे का समय भी आ गया है।
दिल्ली के विधायकों
के वेतन में इजाफे के अलावा सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें भी केन्द्रीय
कर्मियों पर जनवरी 2016 से लागू होनी है। ऐसे में सरकार के पास सांसदों के
वेतन में इजाफे को दरकिनार करना मुश्किल है। सातवें वेतन आयोग ने कैबिनेट
सचिव का मूल वेतन 2.50 लाख रुपए प्रति माह तय किया है।
तो केन्द्र सरकार के
सचिव का वेतन 2.40 लाख रुपए निर्धारित किया गया है। सरकार का मानना है कि
सांसदों-मंत्रियों के वेतन को इस तरह संस्थागत रुप दिया जाता है तो यह सभी
राज्यों के लिए भी मॉडल होगा।
स्वतंत्र कमीशन बनाने का सुझाव
राज्य सरकारें प्रदेश के मुख्य सचिव के वेतन
को आधार बनाकर इसी फार्मूले के अनुरुप मुख्यमंत्री, राज्य सरकार के
मंत्रियों का वेतन तय कर सकती हैं। तो विधायकों का वेतन राज्य के विभागीय
सचिवों के वेतन को आधार बना तय किया जा सकता है। सरकार के इस उच्चपदस्थ
सूत्र के अनुसार इजाफे की आलोचनाओं और राजनीतिक नुकसान की कीमत से सरकार
बखूबी वाकिफ है।
इसीलिए वेतन आयोग की तरह सांसदों के वेतन में महंगाई भत्ते
और सालाना वृद्धि करने के प्रस्ताव पर हम गौर कर रहे हैं। इसके लिए सरकार
स्वतंत्र आयोग बनाने पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। गौरतलब है कि 2005
में जब सांसदों के वेतन-भत्ते में इजाफे के बिल को संसद से पारित किया था
तब पहली बार भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सांसदों के
वेतन-भत्ते के लिए स्वतंत्र कमीशन बनाने का सुझाव दिया था।
कमीशन बनाने के
पक्ष में तीन प्रमुख तर्क दिए गए थे। पहला सांसद अपना वेतन भत्ता बढ़ाने
का फैसला खुद करें यह हितों का टकराव है। दूसरा जब भी माननीयों का वेतन
बढ़ाने का मुद्दा आता है तो यह मीडिया में नकारात्मक रुप से उछलता है और
इसलिए स्वतंत्र व पारदर्शी तंत्र होना चाहिए। तीसरा माननीयों का कम वेतन
उनके ईमानदारी से काम काज करने के फैसले को प्रभावित कर सकता है।