आगरा के रठिया गांव में क्रिसमस के दिन हिंदू धर्म अपनाने वाले कुछ मुस्लिम परिवारों ने अब किसी भी दबाव में धर्म परिवर्तन करने से इनकार किया है। शनिवार को मामले की खबर मिलने पर समझाने आए मुस्लिम संगठन के पदाधिकारियों को इन लोगों ने लौटा दिया।
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धर्म बदलने वालों ने कहा कि उन्होंने सामाजिक बराबरी पाने के लिए स्वयं हिंदू धर्म अपनाया है। इसके लिए उन्हें न तो किसी ने कोई लालच दिया और न ही कोई दबाव डाला।
साथ ही उन्होंने हिंदू धर्म में आस्था व्यक्त करते हुए हवन-आरती कर दिन की शुरुआत की। वेद नगर प्रकरण के बाद डावली के मजरा रठिया में रहमत के 17 सदस्यीय परिवार ने 25 दिसंबर की शाम विधि-विधान के साथ हिंदू धर्म अपना लिया था। शुक्रवार तक इसके बारे में कुछ ही लोगों को जानकारी थी।
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शनिवार को जब धर्मांतरण का मामला उजागर हुआ तो मुस्लिम संघर्ष समिति के पदाधिकारी रठिया पहुंचे। उन्होंने परिवार को समझाने की कोशिश की। मगर, वह धर्म परिवर्तन की बात पर अड़े हुए थे।
गठेली बन चुके रहमत के बड़े बेटे आरिफ उर्फ रवि ने कहा कि काफी सोच-विचार करने के बाद हिंदू धर्म अपनाया है। उनका कहना था कि जब हमें हिंदुओं के बीच ही रहना है तो और उनका धर्म अपनाने में हर्ज क्या है।
हिंदू नामों से है गांव में पहचान
उन्होंने बताया कि ग्राम पंचायत की जिस जमीन पर वह दूसरे लोगों के साथ रहते हैं, वहां बाकी सभी परिवार हिंदू हैं। यहां न कोई मस्जिद है और मदरसा। कब्रिस्तान भी नहीं। जब मुस्लिमों के लिए यहां कोई बंदोबस्त ही नहीं है तो वह मुस्लिम बने रहने में क्या लाभ?
रहमत का भी कहना था कि उसने बेटों की सलाह पर मुस्लिम धर्म अपनाया है। समिति के सदस्यों द्वारा समझाने पर रहमत का मन थोड़ी देर के लिए पलटा भी।
उन्होंने सोचने के लिए 15 दिन की मोहलत मांगी लेकिन उनके बेटों ने तभी कहा कि अब पुनर्विचार नहीं होगा। उन्होंने समिति पदाधिकारियों को उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने को कहा। समिति की तरफ से हाजी जमीलउद्दीन, समी आगाई, सुहैल कुरैशी, अदनान कुरैशी, अहमद हसन आदि पहुंचे थे।
बता दें कि रहमत की पत्नी और बेटों-पुत्र वधुओं और पोते-पोतियों समेत परिवार के 17 सदस्यों ने हिंदू धर्म अपनाया है। इन्होंने शनिवार को बताया कि जन्म के समय रखे गए मुस्लिम नाम तो उनके थे लेकिन उनकी पहचान शुरू से हिंदुओं के बीच रहने के कारण हिदुओं सरीखे नामों से ही थी।
गांव वाले भी उन्हें इसी नाम से बुलाते थे। पड़ोसियों ने भी इसकी तस्दीक की। इसीकारण इनके वोटर कार्ड इन्हीं नामों से बने। दरअसल यह कार्ड भी दूसरी बार बने हैं। पहले इसमें गांव का नाम कुछ और था जिसे इस साल संशोधित कराया गया। इसलिए इन लोगों ने हिंदू धर्म के साथ वही प्रचलित नाम अपनाए।
धर्म बदलने के बाद भी रहेगा पुराना नाम
जयपुर हाईवे से लगभग डेढ़ किलोमीटर अंदर डावली, रठिया में लगभग बीस हिंदू परिवारों के बीच रहमत उर्फ गठेली का परिवार अकेला मुस्लिम है। रहमत पिछले लगभग आठ साल से ग्राम पंचायत की जमीन पर अपने परिवार के साथ यहां रह रहे हैं।
मुस्लिम होते हुए भी उनके बेटों को आसपास के लोग रवि, राजू, मुन्ना और कलुआ के नाम से ही जानते हैं। रहमत को भी अधिकांश लोग गठेली ही बुलाते हैं। इन्हीं नामों से इनके वोटर कार्ड बने।
25 दिसंबर को धर्मांतरण करने वाले इस संयुक्त परिवार के सदस्यों के वोटर कार्ड देखे गए तो वह हिंदू नामों से बने हुए थे। रहमत का गठेली, उनकी पत्नी सायरा का विद्या देवी, बड़े बेटे आरिफ का रवि, उसकी पत्नी नफीसा का मंजू, मंझले मुन्ना का सुघड़, पत्नी शाजिया का राजो नाम से वोटर हैं।
ये कार्ड लोकसभा चुनाव से पहले इसी साल मार्च में बने। इससे संशय खड़ा हो गया कि जब इन्होंने यह नाम अब अपनाया तो वोटर कार्ड इसी नाम से पहले ही कैसे बन गए?
शनिवार को इस बारे में आरिफ ने बताया कि उसका यह नाम जन्म के बाद रस्म अदायगी के लिए रखा गया। लेकिन शुरू से लोग उन्हें बुलाने वाले नाम रवि से ही जानते हैं।
उन्होंने बताया कि मार्च से पहले भी उनके पास रवि नाम वाला वोटर कार्ड था। चूंकि उसमें उनका निवास मलपुरा का महुअर दर्ज था जहां वे पहले रहते थे। अब पूरा परिवार डावली में आ गया तो वोटर कार्ड में संशोधन कराया गया।
बताया कि वे सब जाति से नट हैं। इसलिए उनका कोई स्थायी पता नहीं है। मार्च में कोई सरकारी कर्मचारी आया था और वह परिवार के 18 साल से बड़े सदस्यों का नाम लिखकर ले गया। बाद में वही वोटर कार्ड दे गया।
रवि का कहना है कि हम ग्राम पंचायत की जमीन पर रहते हैं। ऐसे में हमारा मकान नंबर कैसे हो सकता है। वोटर कार्ड पर लिखा मकान नंबर तो सरकारी कर्मचारियों ने ही लिखा है। रवि और उनके तीनों भाई हेयर ड्रेसर हैं।
उनके ग्राहक भी उन्हें इन्हीं नामों से जानते हैं। डावली निवासी लगभग 55 वर्षीय शिव सिंह ने बताया कि वह वर्षों से इस परिवार के सदस्यों को गठेली, रवि आदि नामों से ही बुलाते हैं। रठिया के हाकिम सिंह ने भी बताया कि इस परिवार के सदस्य रहमत, आरिफ आदि के बजाय इन्हें रवि, कलुआ, मुन्ना आदि नामों से ही पुकारे जाते हैं। वे इस गांव में लगभग आठ से रह रहे हैं।