दिल्ली के चुनाव नतीजों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा में मोदी समर्थकों के बीच घमासान तेज कर दिया है। दिल्ली में भाजपा की सियासी दुर्गति के बाद संघ के एक शीर्ष नेता की टिप्पणी है कि पहली बार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की अग्निपरीक्षा दिल्ली में हुई जिसमें वह विफल रहे।
इस नेता के मुताबिक इसी महीने 14, 15 व 16 फरवरी को कानपुर में होने वाली संघ की शीर्ष बैठक में सरकार और भाजपा के चाल चरित्र पर गंभीरता से मंथन होगा और कुछ आवश्यक फैसले भी लिए जाएंगे। इस बैठक में सर संघ चालक मोहन भागवत और सर कार्यवाह सुरेश राव भैया जी जोशी, सह कार्यवाह कृष्ण गोपाल, दत्तात्रेय होसबोले समेत सभी शीर्ष नेता शामिल होंगे। जोशी इस बैठक में एक दिन रहेंगे। जबकि अन्य नेता दोनों दिन विचार विमर्श करेंगे।
'लोकसभा चुनावों की जीत मोदी की लोकप्रियता का पैमाना नहीं'
संघ के इस शीर्ष नेता का मानना है कि 2013 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिली भारी सफलता मोदी की लोकप्रियता का सही पैमाना नहीं थी, क्योंकि देश का जनमानस कांग्रेस के खिलाफ बन गया था और लोग उसके कुशासन से मुक्ति चाहते थे, इसलिए पहले 2013 केविधानसभा चुनावों में जनता ने कांग्रेस को सजा दी और 2014 में यूपीए के मुकाबले क्योंकि नरेंद्र मोदी और भाजपा एकमात्र विकल्प थे, इसलिए लोगों ने उन्हें चुना।
इसी तरह महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और जम्मू में भी कांग्रेस के खिलाफ जनभावना का लाभ भाजपा को मिला, क्योंकि कोई और विकल्प नहीं था। जबकि कश्मीर में पीडीपी का विकल्प होने की वजह से भाजपा वहां कुछ नहीं पा सकी। इसी तरह दिल्ली में जब भाजपा के मुकाबले आम आदमी पार्टी का बेहतर विकल्प जनता के सामने था, तब लोगो ने मोदी की सारी अपील को ठुकराकर केजरीवाल पर भरोसा किया।
संघ के इस शीर्ष नेता ने निजी बातचीत में अपना यह विश्लेषण देते हुए यह भी कहा कि सर संघचालक मोहन भागवत पहले भी यह बात एक बार कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव में लोग यूपीए को हटाना चाहते थे, इसलिए मोदी को इतनी बड़ी सफलता मिली।
'सरकार की कुछ नीतियों ने आम जनमानस में असंतोष पैदा किया'
संघ के इस नेता के मुताबिक भले ही आठ महीने पुरानी केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार या कोई अन्य गंभीर आरोप नहीं है ,लेकिन सरकार की कुछ नीतियों ने आम जनमानस में असंतोष पैदा किया है। जिस तरह आर्थिक सुधारों के नाम पर कार्पोरेट घरानों के पक्ष में नीतियां बनाई जा रही हैं और घोषणाएं हो रही हैं, भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने के लिए अध्यादेश लाया गया, धान, गन्ना और आलू के किसानों पर मार पड़ी और श्रम सुधारों के नाम पर मजदूर विरोधी फैसले लिए गए, उससे मोदी सरकार के खिलाफ जनता में असंतोष पैदा होने लगा। दिल्ली में भी आम लोगों में यही संदेश गया कि सरकार अमीरों के लिए काम कर रही है। जबकि अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने अपनी गरीब समर्थक छवि फिर से बना ली और उसे इसका सीधा फायदा मिला।
उधर भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह के सिपहसालारों ने इस शर्मनाक हार का ठीकरा संघ परिवार के आक्रामक हिंदुत्ववादी एजेंडे पर फोडऩा शुरु कर दिया है। केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के बेहद करीबी भाजपाई बुद्धिजीवी ने ट्वीट करके कहा है कि अब कोई बताए कि हिंदुओं को कितने बच्चे पैदा करने चाहिए और कितने चर्चों पर हमला करना चाहिए। पार्टी के भीतर दिल्ली की रणनीति पर सवाल न उठे इसलिए मोदी और शाह के रक्षा कवच के रूप में संघ की हिंदुत्व ब्रिग्रेड के घर वापसी जैसे कार्यक्रमों, अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयानबाजी आदि को जिम्मेदार बताने का सिलसिला शुरु हो गया है।