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भगत सिंह न कोर्ट गए, न वकील बोला और हो गई फांसी

Fri, 28 Sep 2012 01:11 PM IST
योगेश योगी/हरिद्वार
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह के केस में कोर्ट की कार्रवाई एकतरफा थी। सुनवाई के दौरान भगत सिंह एक बार भी कोर्ट नहीं आए। उनकी तरफ से कोई वकील भी नहीं था। पूरी तरह से एकतरफा मामले को निपटाने में कोर्ट ने फुर्ती दिखाई और चार महीने छह दिन में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव समेत 15 क्रांतिकारियों को दोषी करार दे दिया।
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भगत सिंह पर चले केस के ट्रायल की एक सत्यापित प्रति गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संग्रहालय में रखी है। पूरे ट्रायल में भगत सिंह के कोर्ट आने का जिक्र नहीं है। लाहौर हाईकोर्ट में 5 मई, 1930 को ट्रायल प्रारंभ हुआ। भगत सिंह समेत कुल 18 लोगों पर मुकदमा दर्ज था, लेकिन इनमें से तीन सरकारी गवाह बन गए। 6 मई, 1930 को अदालत के आदेश पर जेल में सभी बंदियों से सवाल पूछा गया कि क्या वह कोई सरकारी वकील चाहते हैं। सबसे पहले नंबर भगत सिंह के जवाब देने का था और उन्होंने एक शब्द का उत्तर दिया, नहीं।

सुखदेव बोले, जैसा भगत सिंह ने कहा। राजगुरु ने कहा, 'अदालत से कोई मदद नहीं चाहते।' इसके बाद अदालत की कार्रवाई एकतरफा चलती रही। सरकारी वकील गवाहों से सवाल पूछता रहा और क्रांतिकारियों को फांसी देने की जमीन तैयार होती रही। एक बार भी भगत सिंह को कोर्ट नहीं लाया गया।
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सेंट्रल जेल लाहौर के कर्मचारी सैय्यद दौलत अली शाह और बख्शीलाल चंद ने अदालत को बताया कि भगत सिंह कोर्ट आना नहीं चाहते हैं। अदालत लाने के लिए उनके साथ कई बार जोर-जबरदस्ती भी की गई और उन्हें मेन गेट तक ले आए, लेकिन इससे आगे वह नहीं बढ़े। 11 सितंबर, 1930 को कोर्ट ने क्रांतिकारियों को दोषी करार दे दिया।

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के जनसपंर्क अधिकारी डॉ. प्रदीप जोशी ने बताया कि 1659 पृष्ठों के ट्रायल में भगत सिंह को फांसी की सजा का जिक्र नहीं है। लाहौर हाईकोर्ट की ओर से उपलब्ध कराए गए ट्रायल की प्रति में भगत सिंह और साथियों को दोषी ठहराए जाने तक की कार्रवाई दर्ज है।

शहीद-ए-आजम पर लगाई गई धाराएं
302- हत्या का आरोप
120- अपराधिक षड्यंत्र रचना
121- सरकार के खिलाफ युद्ध का षड्यंत्र
109- अपराध के लिए उकसाना।

महत्वपूर्ण बिंदु
- 5 मई, 1930 को प्रारंभ हुआ कोर्ट ट्रायल
- 11 सितंबर, 1930 को तय हुआ आरोप
- 1659 पन्नों पर लिखी गई कोर्ट की कार्यवाही।

हड़बड़ी में थी ब्रिटिश सरकार
भगत सिंह का मामला जब सुर्खियों में था तब मुल्क में उनके मुकदमे की खूब चर्चा हो रही थी। लाहौर जेल में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा किया गया 116 दिनों का उपवास युवाओं को प्रेरित कर रहा था। तब भारत के तत्कालीन वायस रॉय लार्ड इरविन शिमला में छुट्टियां मना रहे थे। आनन-फानन में इरविन शिमला से लौटे और उन्होंने मुकदमे की तेजी से सुनवाई के लिए एक विशेष ट्रिब्यूनल का गठन किया। ट्रिब्यूनल ने वही किया, जो इरविन चाहते थे। 10 मई को ट्रिब्यूनल का गठन हुआ था और इसने 7 अक्तूबर को फांसी की सजा सुना दी।

असिस्टेंट जेलर का बयान
मुल्जिम भगत सिंह और बीके दत्त ने अदालत में हाजिर होने से इनकार किया। मैंने उनको पुलिस के सुपुर्द मैन गेट में किया। पुलिस इंस्पेक्टर ने एक-एक मुल्जिम को बाजू से पकड़ा, लेकिन हर एक ने चले आने से इनकार किया।
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- दौलत अली शाह, असिस्टेंट जेलर, सेंट्रल जेल लाहौर (22 मई, 1930 को कोर्ट में दिया गया बयान)
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