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पढ़िए, वहीदा रहमान के नाकाम प्यार की कहानी

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फिल्म बाजी की सफलता ने गुरुदत्त को नई पहचान दी। कभी पैसे का अभाव इतना था कि कालेज की पढ़ाई नहीं कर पाए थे। लेकिन इस फिल्म से उनकी जिंदगी बदलने लगी। वह अच्छे निर्देशकों में माने जाने लगे।
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उनका अगला प्रोजेक्ट सीआईडी था जिसके लिए उन्हें एक सुंदर चेहरे की तलाश थी। दक्षिण में तमिलनाडु के मुस्लिम परिवार में जन्मी वहीदा बेहद सुंदर भी थीं और बातचीत का लहजा भी सुंदर था।

गुरुदत्त को वह कलाकार मिल चुका था जिसकी उन्हें तलाश थी। लेकिन इस फिल्म में उनके लिए बहुत छोटा रोल था, साथ ही एक नृत्य भी। लेकिन अपने अभिनय को उन्होंने साबित किया। इसके बाद अगली फिल्म में वह गुरुदत्त की नायिका थीं। साथ ही फिल्म में नायिका होने के साथ साथ उनमें प्यार हो गया।
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उजड़ गया गुरुदत्त का बसा-बसाया घर

प्यार की यह मंजिल सफल नहीं हुई लेकिन इसने गुरुदत्त के बसे -बसाए घर को अशांत कर दिया। गुरुदत्त का 1953 में गीता राय से शादी हुई थी। लेकिन वहीदा रहमान और गुरुदत के रुमानी किस्से फिजां में उड़ने लगे तो यह घर डोलने लगा। फिर गुरुदत्त के आखिरी दिन तक डोलता ही रहा।  तब उनके पास न अपना परिवार था, न वहीदा रहमान। अगर कुछ था तो केवल शराब।

कहा जाता है कि कागज के फूल दरअसल उनकी अपनी प्रेम कहानी थी। जो वहीदा और उनके प्रेम पर बुनी गई थी। गुरुदत और वहीदा  ने प्यासा, चौदहवीं का चांद और साहिब बीबी और गुलाम में अभिनय किया। प्यासा को टाइम मैगजीन ने समकालीन सर्वक्षेष्ठ फिल्मों में शुमार किया था।

गुरुदत्त की जिंदगी दो नावों में झूल रही थी। एक तरफ गीता दत्त और दूसरे छोर पर वहीदा रहमान।  वह इन रिश्तों में सामंजस्य नहीं बिठा सके। फिल्म जगत की एक प्रेम कहानी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंची।

लुट गए थे वहीदा के साथ ये फिल्म बनाने वाले

फणिश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर शैलेंद्र ने तीसरी कसम फिल्म बनाई थी। बेहतर पटकथा, लोकसंगीत, गीत, यादगार अभिनय  पर न जाने यह फिल्म क्यों नहीं चली। शैलेंद्र के पास जो कुछ था इस फिल्म में लुट गया।

लेकिन तीसरी कसम के गीत संगीत और हीराबाई हीरामन का अभिनय यादगार रहा। वहीदा रहमान इस फिल्म में एक नौटंकी -नृत्यांगना बनी थी। जिसका इलाके में अपना अच्छा खासा नाम होता है।

हालांकि फिल्म में नृत्य के बजाय बेलगाड़ी की यात्रा ज्यादा मनभावन थी। उसी में पूरी फिल्म रची बसी थी। तीसरी कसम के लिए वहीदा रहमान की भूमिका को याद किया जाता था। उस दौर में जब नौटंकी और उसके कलाकार अपनी कला से लोगों का मन बहलाते थे, वहीदा का अभिनय लोगों के दिल पर उतरा था। तीसरी कसम में लच्छू महाराज ने बतौर नृत्य निर्देशक वहीदा रहमान से नृत्य करवाए थे। पूरी फिल्म को ग्रामीण पृष्ठभूमि में फिल्मांकन किया गया था। पूरी फिल्म की शूटिंग अरेरिया जिले में ही हुई थी।

इस गाने के लिए पहली बार वहीदा को पहली बार सेक्सी कहा गया

गुरुदत्त चौदहवीं का चांद फिल्म में इसी शीर्षक गीत पर कुछ खास ढंग से फिल्मांकन करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने विशेष लाइट इफैक्टस तैयार करवाए थे। इस गीत में वहीदा को सोए हुए दिखाया गया है। उन पर कैमरे की रोशनी पड़ती है। लेकिन यह रोशनी इतनी तेज थी कि वहीदा का चेहरे पर उसका असर हो रहा था। आखिर सीन पूरा हुआ। लेकिन दिक्कत आगे थी। सेंसर बोर्ड ने इसे पास नहीं किया। इसकी वजह यह बताई गई कि वहीदा रहमान इसमें सेक्सी लग रही है। सेंसर बोर्ड ने इसे प्रमाण देने लायक नहीं माना।

आखिर किसी तरह तमाम दलीलों के बाद इस फिल्मांकन पर बोर्ड की मंजूरी मिली। यह भी कहा जाता है कि इस गीत को गुरुदत्त कलर फोटोग्राफी में लाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने लंदन से साजो सामान भी मंगवाया था। लेकिन समय पर न पहुंचने पर यह गीत रंगीन नहीं बन सका। लेकिन इस गीत संगीत और अभिनय ने सिने दर्शकों पर जो छाप छोड़ी वह इतिहास बन गया।

जीने की तम्मना मरने का इरादा

गाइड देवानंद और वहीदा की बेहद सफल फिल्म हैं। 1965 में इस फिल्म ने अपना एक मुकाम बनाया। और एक छोटे अंतराल के बाद वहीदा रहमान फिर सिने पर्दे पर थी। फिल्म हर पहलू से पसंद की गई।  आर के नारायण के उपन्यास पर यह फिल्म बनी थी। फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद आर के नारायण ने कहा था कि उनके उपन्यास के साथ पूरा न्याय हुआ। कलाकार अपने अभिनय में बेहद संजीदा थे। पति से प्यार और अपनापन न मिलने पर एक महिला जिस तरह एक राजू नाम के गाइड के प्रेम करने लगती है और उस बीच मन में जिस तरह के द्वंद्व उभरते हैं, जिस तरह के भाव उभरते हैं उस पर यह पूरी पटकथा है। वहीदा रहमान की मासूमियत सौदर्य और  नृत्य क्षमता ने इस फिल्म को ऊंचाई दी है।

वहीदा ने उम्र के इस पड़ाव में भी अभिनय को संजोया है। वाटर , रंग दे बसंती जैसी फिल्मों में उनका अभिनय दिखा है। आज फिल्मों में नृत्यों को वह बदलते समय में कला का एक अलग पड़ाव मानती हैं। लेकिन आज के फिल्मी गीत
उन्हें नहीं भाते। हाल मे उन्होंने कहा कि अब बाबुल की दुआएं लेती जा, चौदहवीं का चांद हो, दुनिया बनाने वाले  जैसे गीत नहीं बनते  फिल्म के गीत अब आइटम सांग होते हैं, पहले गीत फिल्म की स्टोरी को आगे बढ़ाते थे। उनकी अपनी खुशबू होती थी।
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कभी हीरोइन नहीं बनना चाहती थी वहीदा, वो तो...

वहीदा रहमान डाक्टर बनना चाहती थीं। लेकिन तकदीर में उनका सिने जगत की महान अभिनेत्री बनना था। उनकी बहन ने उन्हें भरत नाट्यम सिखाया। वह कुशल नृत्यांगना हो गईँ। वहीदा का सौंदर्य लोगों को आकर्षित करता था और अभिनय के गुण उनमें जन्मजात थे।

शुरू की दो तमिल फिल्मों में उनके अभिनय को सराहा गया। दोनों फिल्में सफल रही थीं। लेकिन प्यासा का सशक्त अभिनय उन्हें एक अलग ऊंचाई दे गया। इसके बाद वहीदा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके नृत्य लोगों को लुभाते रहे।


गाइड फिल्म गीत संगीत प्रधान फिल्म थी। एसडी बर्मन ने इस फिल्म के लिए यादगार संगीत तैयार किया। फिल्म के गीत पिया तोसे नैना लागे रे गीत सिने दर्शकों के मन में बसा है।

देवानंद और वहीदा रहमान की इस फिल्म में  आज फिर जीने की तमन्ना है गीत में वहीदा ने जिस हाव भाव के साथ मन की उमंगों का इजहार किया था, वह सिने दर्शकों को रोमांचित कर ही गया। यह गीत एक शादी शुदा महिला के मन के भाव की अभिव्यक्ति के तौर पर था।

लेकिन इस फिल्म का पिया तोसे नैना लागे गीत में वहीदा अपनी संपूर्ण कला के साथ प्रस्तुत थी। यह फिल्म के सुंदर नृत्य प्रधान गीतों में है। वहीदा ने इसके साथ न्याय किया। इस गीत में एसडी बर्मन ने लगभग हर साज बजवाया। कहा जाता है कि फिल्म जगत का तब शायद ही कोई साज रहा हो, जो इस गीत में प्रयोग में न लाया गया हो।
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