हिमाचल में बरसाती सीजन के बाद से सूबे में पर्याप्त बारिश और बर्फबारी न होने से सूखे जैसे हालात हो गए हैं। बर्फबारी तो दूर महीनों से हिमाचल बारिश की हल्की फुहार को भी तरस गया है। प्रदेश में ऐसे हालात ग्यारह साल बाद बने हैं।
सूखे के शुरुआती दौर में ही प्रदेश के किसानों को करोड़ों की चपत लग चुकी है। सरकार ने नुकसान के आकलन के आदेश तो दिए हैं लेकिन किसानों की भरपाई के इंतजाम फिलहाल दूर की कौड़ी ही बने हुए हैं।
अमर उजाला ने हालात की संवेदनशीलता को समझते हुए प्रदेश के तमाम जिलों की ग्राउंड रिपोर्ट लेने की कोशिश की है। इसमें कहीं बीजी गई गेहूं-जौ की फसल पीली नजर आई तो कहीं मटर, लहसुन, प्याज, सरसों और आलू के खेत मुरझा चुके हैं।
टमाटर में न आकार आ रहा और न ही रंग। 50 फीसदी फसलें मुरझा गई हैं। सेब बगीचों में चिलिंग आवर्स पूरे नहीं हो पा रहे। वूली एफिड कीट सेब पेड़ों को नुकसान पहुंचा रहा है। छोटे नदी-नाले सूखने की कगार पर हैं।
पीने का पानी नहीं मिल रहा तो फसलों की कौन सोचे। अगले एक सप्ताह तक बारिश के कोई आसार नहीं हैं। ऐसे में किसानों को मेहनत मिट्टी होने का डर सता रहा है।
यहां 26,138 हेक्टेयर बारिश के भरोसे
बिलासपुर जिले में तीस हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर फसलें सूखे से प्रभावित हो सकती हैं। आने वाले 15 दिनों के अंदर बारिश नहीं होती है तो गेहूं की पैदावार पर इसका विपरित असर पड़ना तय है।
बिलासपुर जिले में 31,878 हैक्टेयर भूमि पर विभिन्न प्रकार की फसलें, सब्जियां, फल उगाए जाते हैं। केवल 5,740 हैक्टेयर भूमि पर ही सिंचाई की सुविधा है। जिले में 26,400 हेक्टेयर भूमि पर गेहूं पर फसल उगाई जाती है।
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अभी तक जिला में सूखे जैसे हालात नहीं हैं लेकिन अगले 15 दिन बेहद नाजुक साबित हो सकते हैं। प्रभावित इलाकों में अपर नयना देवी क्षेत्र, हरलोग, स्वारघाट, नम्होल, कोटधार, बंदला, लाड़ाघाट सहित अन्य अपर एरिया शामिल हैं।
इस बारे में कृषि विभाग के उपनिदेशक डॉक्टर डीएस पंत का कहना है कि अभी 15 दिन और तक बारिश का इंतजार किया जा सकता है। अभी तक कहीं से भी किसी प्रकार की सूखे की रिपोर्ट नहीं आई है।
हमीरपुर में 27 करोड़ रुपये का नुकसान
जिला हमीरपुर में सूखे की मार पड़ गई है। कृषि क्षेत्र में अभी तक 27 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। अगर अगले बीस दिनों तक बारिश न हुई तो नुकसान का यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है। जिले मेें 99 फीसदी कृषि मौसम पर निर्भर है।
सिंचाई का कोई साधन न होने से खेतों में बीजी गई गेहूं की फसल बर्बाद होने की कगार पर है। कृषि विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक 35 फीसदी नुकसान हो चुका है। जो आने वाले समय में 50 से 60 फीसदी पहुंच सकता है।
घटा जलस्तर, शिमला में संकट
जिले में 12,200 हेक्टेयर भूमि पर गेहूं, 3800 पर जौ और 9000 हेक्टेयर पर सब्जी लगाई जाती है। लेकिन इस बार समय पर बारिश न होने से कृषि पर चौपट होने का खतरा मंडराने लगा है। किसानों को बड़े नुकसान की आशंका है।
सूखे के चलते शिमला की सभी पांच पेयजल परियोजनाओं के जलस्तर में भारी कमी आ गई है। हालत यह है कि सितंबर में जिन परियोजनाओं से 47 से 50 एमएलडी पानी शिमला सप्लाई हो रहा था, उनसे अब 35 से 40 एमएलडी तक ही सप्लाई हो रही है। शिमला शहर को करीब 45 एमएलडी की रोजाना जरूरत पड़ती है। शहर में तीसरे चौथे दिन पानी आ रहा है।
डेढ़ माह से बारिश न होने से किसान और बागवान परेशान
जिला चंबा में डेढ़ महीने से बारिश का इंतजार कर रहे किसानों की मेहनत पर पानी फिरना शुरू हो गया है। अब तक बीस फीसदी खेती चौपट हो चुकी है। जल्द बारिश न होने पर बाकी बची फसल भी संकट में है। उधर, सेब के बगीचों से नमी गायब हो रही है।
गेहूं की बेहतर पैदावार की उम्मीद भी बारिश के इंतजार में धूमिल होती जा रही है। जिले में गेहूं की बीजाई करीब 21,500 हेक्टेयर पर होती है। निचले क्षेत्रों में बारिश की वजह से गेहूं की बीजाई निर्धारित समय में नहीं हो सकी। जिसके चलते दिसंबर माह में अधिकतर किसानों ने गेहूं की बीजाई की। लेकिन बारिश न होने से गेहूं की फसल पर भी विपरीत असर पड़ना शुरू हो गया है।
सूखे की चपेट में 51508 हैक्टेयर कृषि-बागवानी
देव भूमि कुल्लू घाटी में लगभग 70 हजार परिवार कृषि पर निर्भर हैं। जिले में ऊंट के मुंह में जीरे समान हुई बारिश से रबी की 35 फीसदी खेतों में की फसलें कुम्हलाने लगी हैं। कुल्लू में रबी की फसल करीब 21066 हेक्टेयर में की जाती है।
14000 हेक्टेयर भूमि पर गेंहू ,जौ 3000, लहसुन 1200 हेक्टेयर ,प्याज 500 बीघा और मटर 1200 हेक्टेयर और साग-सब्जियां सैकड़ों हेक्टेयर भूमि पर पैदा हो रही हैं। सूखे का सबसे अधिक असर जौ, गेहूं व लहसुन की खेती पड़ रहा है।
पौध विकास रुका, कीटों के हमले का डर
शुष्क मौसम में किसानों को अपनी मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। बारिश न होने के कारण फसलों में कीट पनपने का भय और पीला रतुआ रोग होने का अंदेशा भी जताया जा रहा है। सामान्य मौसम में गेहूं के पौधे अब तक डेढ़ फीट तक बढ़ जाते हैं लेकिन बारिश न होने से फसल बढ़ नहीं पाई है।
रेनफेड एरिया में किसान बारिश पर निर्भर रहते हैं। सोलन दो क्षेत्रों के तहत बंटा हुआ है। जिसमें पहाड़ी व मैदानी क्षेत्र आता है। सिंचाई सुविधा वाली जमीन 4861 हेक्टेयर है, जबकि 6270 हेक्टेयर भूमि बीजाई कार्य के लिए बारिश पर निर्भर करती है।
हजारों हेक्टेयर में होने वाली फसल पर संकट
जिले में सूखे से 64 हजार हेक्टेयर भूमि पर होने वाली कृषि पर संकट के बादल छा गए हैं। जिले में बारिश ने होने के कारण नकदी फसलों में मटर, लहसुन की फसलों को भी इस वर्ष खासा नुकसान पहुंचा है। करीब चार दशकों बाद सूखे की यह स्थिति बनी है। इसमें चार माह तक लगातार बारिश नहीं हुई है।
गंदम की फसल के साथ नकदी फसलों और सेब की पैदावार पर भी मौसम की मार पड़ रही है।उपायुक्त मंडी ऋग्वेद ठाकुर ने कहा कि फील्ड से रिपोर्ट ली जा रही है। यदि 10 दिन तक बारिश न हुई तो फसल की पैदावार पर अधिक संकट बढ़ जाएगा।
सिरमौर में सूखे से करोड़ों का नुकसान
सिरमौर जिले में सूखे से गेहूं समेत सब्जियों की फसल को करोड़ों का नुकसान हो गया है। अकेले गेहूं की फसल को ही 20 करोड़ से अधिक के नुकसान का अनुमान है। जल्द बारिश न हुई तो नुकसान और बढ़ सकता है। गेहूं की करीब 50 फीसदी फसल तबाह हो गई है। गेहूं पीली पड़ने के साथ सूखने लगी है।
विभाग सूखे से हुए नुकसान की रिपोर्ट तैयार करने में जुटा है। सिरमौर में लगभग 23 हजार हेक्टेयर भूमि पर गेहूं की खेती की गई है। विभाग के मुताबिक गेहूं को 20 करोड़, लहसुन और अन्य सब्जियों को 2.83 करोड़ का नुकसान आंका गया है।
1.16 करोड़ की दलहनी फसलें प्रभावित हो चुकी हैं। सूखे से जिले के नौहराधार, हरिपुरधार, संगड़ाह, शिलाई, कफोटा और रोहनाट आदि क्षेत्रों की कई पंचायतों में गेहूं की फसल प्रभावित हो रही है। सैनधार, धारटीधार और पच्छाद क्षेत्र की कई पंचायतों में भी सूखे की मार से फसलें सूख रही हैं।
इन क्षेत्रों में ज्यादातर पंचायतें और गांव ऐसे हैं, जो बारिश पर ही निर्भर हैं। इन क्षेत्रों में 60 फीसदी किसानों के पास सिंचाई सुविधा नहीं है। महज 40-50 फीसदी किसान ही फसलों की समय पर सिंचाई कर पाते हैं।
कांगड़ा में 10 फीसदी गेहूं खराब
कांगड़ा जिले में सूखा किसानों के लिए परेशानी का कारण बन गया है। दिसंबर माह में जिला कांगड़ा में सामान्य से 50 प्रतिशत कम बारिश हुई। जनवरी माह में एक फीसदी भी बारिश नहीं हुई।
पहले किसान गेहूं की बीजाई को लेकर परेशान रहे। 12 दिसंबर को बारिश होने से जिला कांगड़ा में पूरे 94 हजार हेक्टयर में गेहूं की बिजाई हो गई थी। अब हालत चिंताजनक हैं। खासकर चंगर क्षेत्रों में गेहूं को लेकर किसान परेशान हैं।
कृषि विवि के कृषि वैज्ञानिक डा. एससी नेगी का कहना है कि बारिश न होने से इस समय करीब पांच से दस प्रतिशत नुकसान हुआ है। गेहूं, जौ, राई, बाजरा व चारे की फसलों को नुकसान पहुंचा है। डीसी कांगड़ा संदीप कुमार ने कहा कि जनवरी में एक फीसदी भी बारिश नहीं हुई है। प्रशासन हर स्थिति को भांपकर तैयारी कर रहा है।
यहां सूखे की जद में 60 फीसदी खेती
जिले की साठ फीसदी खेती सूखे की जद में है। एक सप्ताह तक यदि बारिश न हुई तो किसानों की फसलें बर्बाद हो सकती हैं। ऊना जिले में लगभग 13 हजार हेक्टेयर सिंचित और 21 हजार असिंचित भूमि है। लोगों ने गेहूं सहित अन्य फसलों की बीजाई कर रखी है।
लेकिन अब बारिश न होने से किसानों की मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। किसानों विशाल ठाकुर, राजेश, रामपाल, पम्मा, जसवंत सिंह, ज्योति, यशपाल, पंकज, मक्खन सिंह सहित अन्यों ने कहा कि पहले उन्होंने महंगे बीज लेकर गेहूं की फसल की बीजाई की।
फसल की बीजाई के लिए पहले सिंचाई काफी मश्क्कत से की और अब उसकी पैदावार सूखे की चपेट में आ सकती है। कृषि उपनिदेशक यशपाल चौधरी ने कहा कि अभी तक फसलों को कोई नुकसान नही पहुंचा है। यदि एक सप्ताह के भीतर बारिश न हुई तो क्षेत्र की फसलें प्रभावित हो सकती हैं।
हिमाचल में ये है कृषि की स्थिति
80.23 प्रतिशत भूमि वर्षा जल पर निर्भर
87.95 प्रतिशत कृषक लघु एवं मध्यम श्रेणी के हैं
62 प्रतिशत जनसंख्या को कृषि से रोजगार मिलता है
55.67 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से 9.55 लाख हेक्टेयर भूमि क्षेत्र आपरेशनल जोतों का है
1251 मिली मीटर बारिश का पैमाना प्रदेश की औसत है, इसमें से करीब 80 फीसदी मानसून काल में ही पानी बरस जाता है।
1540 मीट्रिक टन सब्जियों की पैदावार हुई 2017-18 में