68 साल के समाजवादी पार्टी के नेता और यूपी. सरकार के कबीना मंत्री आजम खां राजनीति में पूरा ठसक भरा जीवन जीते हैं। याददाश्त के धनी आजम खां के बारे में आम हैं कि उन्हें दोस्त और दुश्मन की खरी पहचान है।
एक बार ठान लेते हैं तो कभी छोटे-मोटे विरोधियों की परवाह नहीं करते और जब अपने विरोधी से टकराते हैं तो बाजी जीतने के लिए बस जुबानी जंग ही काफी है। खैर, आजम के अल्हड़पन से भरे बिंदास मिजाज वाले जुझारू स्वभाव के छोटे लोहिया कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र भी कायल थे। इतना ही नहीं समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव भी उनपर भरपूर भरोसा करते हैं।
यह आजम की शख्सियत ही है कि रामपुर उन्हें चुनाव में निराश नहीं करता। मुलायम भी पूरा मान रखते हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश की नजर में वह अपना स्थान रखते हैं। 2012 के बाद से उ.प्र. के साढ़े चार मुख्यमंत्रियों में गिने जाते रहे और पत्नी ताजीन फातिमा राज्यसभा सांसद हैं। इतना ही नहीं 1989 से लेकर अबतक जब भी प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी, उसमें आजमा खां कैबिनेट मंत्री जरूर बनाए गए।
रामपुर के साधारण परिवार में जन्मे
कैबिनेट मंत्री आजम खां
- फोटो : amar ujala
रामपुर के साधारण परिवार में 14 अगस्त 1948 को पैदा हुए आजम खां सुन्नी पठान हैं। प्रारंभिक शिक्षा रामपुर के बकर स्कूल में ही हुई और सुंदरलाल इंटर कालेज से पढ़ाई करने के बाद वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय चले आए।
यहीं से न केवल छात्र राजनीति में हिस्सा लिया, विश्वविद्यालय छात्रसंघ के सचिव रहे बल्कि बैचलर ऑफ लॉ की डिग्री लेने के बाद 1976 में जनता पार्टी से जुड़ गए। रामपुर लौटे तो जिला अदालत में वकालत और राजनीति साथ-साथ शुरू की। गरीबों, मजलूमों, रिक्शावालों, तांगा वालों के हित की लड़ाई लडऩे लगे। बस फिर क्या था राजनीति में वह हर सफर में बस ही बढ़े। खम ठोंककर रामपुर के नवाब मिक्की मियां को चुनौती दे दी। आज भी आजम खां का उनकी बेगम नूर बानों से पूरा राजनीतिक विरोध रहता है। आजम जमीन से जुड़े रहते हैं और हर साथी को पहचानते हैं। शायद यही वजह भी है कि रामपुर उन्हें चुनाव में उतरने पर कभी निराश नहीं करता।
जेल भी गए
फासीवाद, राजनीतिक अन्याय और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बुलंद आवाज उठाने आजम खां हमेशा मुखर रहे। अलीगढ़, फैजाबाद, उन्नाव, वाराणसी तक वह बोलते रहे और इसी के तहत उन्हें जेल जाना पड़ा। आपातकाल के दौरान भी मीसा के तहत गिरफ्तार हुए। राम मंदिर आंदोलन के दौरान जब भाजपा की तरफ विनय कटियार, उभा भारती, साध्वी ऋतंभरा, कल्याण सिंह का तीखा हमला चल रहा था तो मुलायम सिंह यादव के पास एक अकेले आजम खां निबटने के लिए काफी थे।
मुकाम बदलते रहे
आजम खान
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राजनीति में जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल जैसे मुकाम बदलते रहे। अंत में मुलायम के साथ समाजवादी पार्टी का गठन का आखिरी ठिकाना रहा। हालांकि 2009 में आजम खां ने अमर सिंह से नाराजगी की वजह से बगावती तेवर अख्तियार लिया था।
24 मई 2009 को छह साल के पार्टी से निष्कासित किए गए थे लेकिन अमर सिंह को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद उनके पुराने दोस्त मुलायम सिंह 4 मई 2010 को उनका निलंबन वापस ले लिया। लेकिन इस दौरान जितनी मुलायम आजम की कमी झेल रहे थे उतना की आजम को मुलायम से दूर जाना खल रहा था। जनेश्वर मिश्र भी कहा करते थे आजम समाजवादी पार्टी से दूर रहकर चैन से नहीं रह सकते और न ही आजम के बगैर मुलायम को चैन मिलेगा।
चेहरा
आजम किसी सांप्रदायिक शक्ति के खिलाफ खड़े होने वाला समाजवादी पार्टी का मजबूत अल्पसंख्यक चेहरा हैं। मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान भी नाम उछला और राम मंदिर आंदोलन के दौरान भी हिन्दुत्व की अलंबरदारी कर रहे नेताओं से जुबानी जंग में अकेले भिड़े रहे। समाजवादी पार्टी के विधायक शाकिर अली ने भी नाराज होने पर पार्टी को ताकीद करते हुए आजम खां का अर्थ पांच एम से बताया। पांच एम से आशय मौलाना, मुलायम, मदरसा, मदारिस से ही था। वास्तव में मुलायम और समाजवादी पार्टी के लिए आजम का यही चेहरा है। हमेशा कद्दावर नेता बने रहे।
टॉपते रहे बुखारी
आजम खां
- फोटो : amar ujala
जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी से आजम खां का छत्तीस का अंाकड़ा है। 2012 के चुनाव में अल्पसंख्यकों मतों को साधने के लिए मुलायम ने अहमद बुखारी को करीब कर लिया था। तब आजम बुखारी से पूरी तरह चिढ़ते रहे। अहमद बुखारी भी आजम के लिए चुनौती बनने की कोशिश करते रहे, लेकिन अंत में मुलायम को अहमद बुखारी से दूरी बनानी पड़ी। दरअसल आजम खां के बारे में आम है कि वह दोहरा जीवन नहीं जीते। अच्छे प्रशासक हैं और छोटे स्तर के राजनीतिक छीछीलेदर भरे जीवन में भरोसा नहीं करते। जब 2012 में मुलायम ने अखिलेश को अपना उत्तराधिकारी बनाकर उ.प्र. का मुख्यमंत्री बनाया तब भी लोगों को लग रहा था कि शायद आजम न माने। कुछ दिन तक पूरा अवध इस आशंकाओं में दो-चार रहा, लेकिन आजम ने पूरे पांच साल के दौरान ऐसा कुछ नहीं किया।
और खो गई भैंस
आजम खां के फार्म हाऊस से भैंस चोरी हो गई। यह भैंस उसी समय चोरी हुई जिस समय मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक चिनगारी चमक रही थी। आजम की भैंस चोरी को लेकर प्राथमिकी दर्ज हुई और लापरवाही बरतने में दरोगा तथा दो सिपाही लाइन हाजिर कर दिए गए। भैंस क्या खोई आजम खां की भैंस और उ.प्र. पुलिस पर व्यंग वाण शुरू हो गए। हालांकि दो दिन के भीतर ही उ.प्र. पुलिस ने आजम की भैंस को ढूंढ निकाला था।
आजम के बोल
पिता-पुत्र में सुलह की कोशिशों में जुटे आजम
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आजम खां की सख्शियत जितना उनके व्यक्तित्व पर टिकी है, उसमें उनकी जुबान का भी योगदान है। आजम को सुर्खियों में बने रहना आता है।
तंज, व्यंग, तीखे जहर बुझे जुबानी तीर चलने में माहिर है। जब भरे पूरे अंदाज में हों तो एक बार श्रोता की सुध बुध अपनी ओर मोड़ लेने की क्षमता रखते हैं। मुद्दों को भटकाना, राजनीति में माहौल बदलना बखूबी आता है। विवादित बोल में माहिर हैं और अंजाम की परवाह नहीं करते। जब फिल्म अभिनेत्री जया प्रदा से नाराज हुए तो 2009 के चुनाव प्रचार के दौरान खुलकर बगावत पर उतर आए। हराने में लग गए और कहा भी नाचने गाने वाली हैं। इनका क्या ? आई हैं और चुनाव के बाद अपने पेशे में चली जाएंगी। हालांकि इस चुनाव में आजम के विरोध के बाद भी जया प्रदा जीत गई थी। जया का चुनाव मुलायम सिंह के लिए साख का सवाल बन गया था और उन्हें खुद रामपुर में डेरा डालना पड़ा था।
-आजम ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान पर भी तंज कसते हुए कहा था- कुत्ते के पिल्ले के बड़े भाई हमें तुम्हारा गम नहीं चाहिए (गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विदेशी पत्रकार के साथ इंटरव्यू में कुत्ते के पिल्ले के कार के पिछले पहिए के नीचे का जिक्र किया था। )
-अमित शाह को लेकर 2014 में आम चुनाव के दौरान तंज कसते हुए कहा-302 का अपराधी गुंडा नं.-1 शाह उ.प्र. में दहशत फैलाने आया है। ....जब इस वक्तव्य पर राजनीतिक शोर मचना शुरू हुआ तो आजम के व्यंग और तीखे हो गए। बोल पड़े-तो क्या ऐसे अपराधी(अमित शाह को) भारत रत्न दिलवा दूं। हालांकि ऐसे बयान के लिए चुनाव आयोग ने भी उन्हें नोटिस जारी किया था।
-भीमराव अंबेडकर के बारे में भी बोले और कहा- अंबेडकर का एक हाथ और एक अंगुली उठकर आगे ईशारा करती हुई है कि जो प्लॉट खाली है, वह हमारा है।
-लाख आलोचनाओं के बाद भी आजम इस बयान पर कायम हैं कि कारगिल युद्ध में हिन्दुओं ने नहीं मुसलमान सैनिकों ने दिलाई थी।
-आजम खां 2012 में मंत्री बने थे। मीटिंग चल रही थी और एक आईएएस अधिकारी से उलझ गए। कह बैठे-क्या बकवास करते हो.....चुप बैठिए......बत्तमीज कहीं के।
मांगनी पड़ी माफी
आजम खान
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विवादित बोल आजम के लिए कोई अजूबी बात नहीं है। जब बुलंदशहर के पास बलात्कार जैसी दुर्घटना हुई तब आजम खुद को विवादित बोल से रोक नहीं पाए। इसका नतीजा यह हुआ कि मामले उच्चतम न्यायालय ने फटकार लगाई और उन्हें माफी तक मांगनी पड़ी।
आजम खां से अमर सिंह के बारे में चर्चा करना ही बेकार है। सवाल शुरू होने के पहले कह बैठते हैं। सत्ता के दलाल हैं। इनके बारे में क्या बोलें।
दुश्मन
आजम खां के राजनीति में, धर्म की राजनीति में दुश्मन भी हैं। शाही इमाम अहमद बुखारी उन्हें रास नहीं आते। समाजवादी पार्टी के विधायक शाकिर अली ने विरोध करना शुरू किया तो आजम ने उन्हें भाव ही नहीं दिया। हां, अमर सिंह का वह साया भी बमुश्किल ही देखना चाहते हैं। 2007 से परवान चढ़ा यह बैर 2009 में मुखर हो गया था। इतना कि जिस जयाप्रदा को आजम रामपुर से नूर बानों को चित करने के लिए ले गए थे, उसी को हराने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया। दुश्मनी इतनी की अमर सिंह की मौजूदगी में वह न तो मुलायम से बात करना चाहते हैं और न ही सुलह सफाई के क्रम में उन्हें लखनऊ हवाई अड्डे लेने गए। बस ठान ली तो ठान ली।
भरोसा
आजम खां पर उनका हर दोस्त आंख मूंदकर भरोसा कर सकता है और हर दुश्मन को वह प्रभाव में रहने के दौरान सपने में आएंगे। फिलहाल खां को अखिलेश यादव का भरोसा हासिल है। वह मुलायम सिंह यादव के पुराने सिपहसालार हैं। शिवपाल और प्रो. राम गोपाल से उनका बराबर का रिश्ता है। समाजवादी पार्टी में मचे घमासान के दौरान वह लगातार तटस्थ रहे हैं। मुलायम को भी नाप-तौलकर सलाह दी है और अखिलेश को भी इसी तरह की नसीहत देते आए हैं।