आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राम मंदिर के निर्माण में कानूनी अड़चन के कारण हो रही देरी को एक तरफ रखते हुए कहा कि सामान्य जनता इसके लिए धैर्य नहीं रख सकेगी, इसलिए अयोध्या में जल्द से जल्द मंदिर का निर्माण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर समाज के सभी लोग सत्य को समझना चाहें और उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हों तो किसी भी मुद्दे पर हिंसा का त्याग करते हुए एक शांतिपूर्ण हल प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन, राम मंदिर जैसे गंभीर विषय पर इस तरह के तर्क देना कि राम यहां पैदा ही नहीं हुए, आपसी सामंजस्य को तोड़ता है और इससे टकराव का रास्ता तैयार हो जाता है। इससे बचना चाहिए।
दिल्ली में गुरूवार को एक पुस्तक विमोचन के अवसर पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि समाज में तरह-तरह के लोग होते हैं। जो लोग एक अलग प्रकार के बौद्धिक होते हैं, उनका ईश्वर निराकार हो सकता है, ऐसे लोगों के लिए मंदिर की आवश्यकता भले ही न हो, लेकिन इस देश की करोड़ों की जनता को सिर्फ साकार ईश्वर का अस्तित्व समझ में आता है, और उनकी भावनाओं की संतुष्टि साकार ईश्वर से ही हो सकती है। ऐसे लोग राम मंदिर के लिए अब और ज्यादा धैर्य नहीं रख सकते। उन्हें अयोध्या में अपने आराध्य देव का मंदिर मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ऐसा चाहने वालों में सिर्फ हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि गैर हिंदू भी शामिल हैं क्योंकि उनकी पहचान भी उस देश से जुड़ी है जिसकी पहचान श्री राम से होती है। मोहन भागवत ने कहा कि भगवान राम को भी युद्ध करना पड़ा था, लेकिन युद्ध के पहले उन्होंने उसे रोकने की हर संभव कोशिश की थी। कोई भी हिंसा रोकी जा सकती है, अगर उससे जुड़े हुए सभी पक्ष मामले के सच को समझने और स्वीकार करने के लिए तैयार हों। उन्होंने कहा कि यह आवश्यक नहीं कि सच हमेशा प्रिय ही लगे। कई बार यह अप्रिय भी लग सकता है, लेकिन सच को स्वीकार करने से हिंसा रोकी जा सकती है जबकि सच स्वीकार न करने से हिंसा होती है। उन्होंने कहा कि अहंकार में या किसी स्वार्थ के कारण जब सच को अस्वीकार किया जाता है तो अयोध्या में
महाभारत हो जाता है। ऐसा नहीं होना चाहिए और हर हाल में हिंसा से बचा जाना चाहिए.