कई बार तो रात में मुझे आश्रम से भागते हुए किसी बुजुर्ग व्यक्ति को पकड़कर यह समझाना होता है कि जिन पोती-पोते के लिए आप यहां से भाग रहे हैं, उन्हें आपकी शक्ल तक याद नहीं है और उनका आपके अस्तित्व से भी कोई वास्ता नहीं है। वृद्धाश्रम के कुछ सदस्य हमेशा अकेले रहना पसंद करते हैं। वे किसी से बात नहीं करते या दूसरों की बातों का जवाब नहीं देते। जब मैं भी उनकी कोई मदद नहीं कर पाती, तो उनकी चुप्पी मुझे परेशान करती है।
लेकिन ऐसे भी कई उदाहरण हैं, जब मैं उन्हें लगातार एक ही बात दोहराकर परेशान नहीं करती कि यह काम न करिए, जबकि वे वही काम कर रहे होते हैं। वृद्धों के विभिन्न व्यवहार से मैंने सीखा है कि जब कोई व्यक्ति बूढ़ा हो जाता है, तो उसका दिमाग उन घटनाओं और लोगों को पुनर्जीवित करना शुरू करता है, जिनसे उसका सामना दशकों पहले या बचपन के दौरान हुआ था। वह उन घटनाओं को खोदना शुरू कर देता है, जो कभी उसके दिल के करीब थे और वह उन बातों को अपने आसपास के लोगों को बताना शुरू कर देते हैं।
लेकिन जिन लोगों को बूढ़ों के इस व्यवहार के पीछे की हकीकत नहीं पता, वे उन्हें मानसिक रूप से बीमार या पागल समझकर ऐसे ही वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं। एक लंबा वक्त बिताकर मैंने बुजुर्गों की जरूरतें समझी हैं। और लगातार उनकी मदद भी कर रही हूं। यह काम केवल मेरी ड्यूटी ही नहीं है, बल्कि इस काम में मुझे आनंद आता है। इंसानियत की खुशबू भरे अपने बगीचे सरीखे वृद्धाश्रम को सींचने में मैंने अपने जीवन के तमाम ऐशो-आराम को तिलांजलि दी है। मैंने परिवार से लड़ाई लड़ी है और समाज से तिरस्कृत की गई हूं। लेकिन इसके बदले मुझे कई मां-बाप मिले हैं, जिनकी मैं सेवा कर रही हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।