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अपने जीवन के तमाम ऐशो-आराम को तिलांजलि देकर, वृद्धाश्रम में इंसानियत की खुशबू बिखेर रहीं हैं

Mon, 23 Apr 2018 09:15 PM IST
सेल्वारानी
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Selvarani
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मैं तमिलनाडु के तिरुवरूर जिले में स्थित एक वृद्धाश्रम की वार्डन हूं। पिछले आठ साल से भी ज्यादा वक्त से मैं यही काम कर रही हूं। इससे पहले भी मैं कुछ ऐसा ही काम कर रही थी। मैंने लंबे समय तक एक पुनर्वास केंद्र में परामर्शदाता के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। उस काम से मिले अनुभवों ने ही मुझे सेवा का मार्ग चुनने के लिए प्रेरित किया था, जो मुझे जीवन में संतुष्टि प्रदान करता है।

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मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मैं दस साल की थी, तब मैंने पहली बार साइकिल चलाई थी। एक रूढ़िवादी समाज में कोई इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि एक लड़की भी साइकिल चला सकती है। मैं बचपन से उन सभी मुद्दों का विरोध करती रही हूं, जो समाज में बिना किसी तार्किक वजह से निषिद्ध हैं। मैं खुद को मूक विद्रोही मानती हूं। शायद इसी फितरत के चलते मैंने बहुत पहले ही तय कर लिया था कि मैं शादी नहीं करूंगी।

पुनर्वास केंद्र में परामर्शदाता के रूप में कार्य करने के दौरान लोगों की मानसिकता के बारे में मेरी समझ में इजाफा हुआ। मुझे पता चला कि किसी के जीवन को कम दुखी बनाने के लिए क्या जरूरी है। हालांकि वृद्धाश्रम की वार्डन बनने का काम मेरे लिए कभी इतना आसान नहीं रहा। कई दफे ऐसा होता है कि कोई वृद्ध देर रात को चिल्लाते हुए रोता है क्योंकि उसे उस वक्त अपने प्रियजनों की याद आ रही होती है। वे प्रियजन, जिन्होंने उसे खुद से दूर वृद्धाश्रम में भेज दिया है।

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Selvarani
कई बार तो रात में मुझे आश्रम से भागते हुए किसी बुजुर्ग व्यक्ति को पकड़कर यह समझाना होता है कि जिन पोती-पोते के लिए आप यहां से भाग रहे हैं, उन्हें आपकी शक्ल तक याद नहीं है और उनका आपके अस्तित्व से भी कोई वास्ता नहीं है। वृद्धाश्रम के कुछ सदस्य हमेशा अकेले रहना पसंद करते हैं। वे किसी से बात नहीं करते या दूसरों की बातों का जवाब नहीं देते। जब मैं भी उनकी कोई मदद नहीं कर पाती, तो उनकी चुप्पी मुझे परेशान करती है।

लेकिन ऐसे भी कई उदाहरण हैं, जब मैं उन्हें लगातार एक ही बात दोहराकर परेशान नहीं करती कि यह काम न करिए, जबकि वे वही काम कर रहे होते हैं। वृद्धों के विभिन्न व्यवहार से मैंने सीखा है कि जब कोई व्यक्ति बूढ़ा हो जाता है, तो उसका दिमाग उन घटनाओं और लोगों को पुनर्जीवित करना शुरू करता है, जिनसे उसका सामना दशकों पहले या बचपन के दौरान हुआ था। वह उन घटनाओं को खोदना शुरू कर देता है, जो कभी उसके दिल के करीब थे और वह उन बातों को अपने आसपास के लोगों को बताना शुरू कर देते हैं।

लेकिन जिन लोगों को बूढ़ों के इस व्यवहार के पीछे की हकीकत नहीं पता, वे उन्हें मानसिक रूप से बीमार या पागल समझकर ऐसे ही वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं। एक लंबा वक्त बिताकर मैंने बुजुर्गों की जरूरतें समझी हैं। और लगातार उनकी मदद भी कर रही हूं। यह काम केवल मेरी ड्यूटी ही नहीं है, बल्कि इस काम में मुझे आनंद आता है। इंसानियत की खुशबू भरे अपने बगीचे सरीखे वृद्धाश्रम को सींचने में मैंने अपने जीवन के तमाम ऐशो-आराम को तिलांजलि दी है। मैंने परिवार से लड़ाई लड़ी है और समाज से तिरस्कृत की गई हूं। लेकिन इसके बदले मुझे कई मां-बाप मिले हैं, जिनकी मैं सेवा कर रही हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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