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युवाओं के लिए बने लोकतंत्र का एजेंट, नौकरी छोड़कर पूरी तरह से मतदाता पंजीकरण अभियान में जुटे

Sat, 21 Apr 2018 07:42 AM IST
आनंद तीर्थ
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आनंद तीर्थ
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हो सकता है कि मेरी तरह आपने भी बालिग होते ही वोट देने का हक हासिल कर लिया हो। मगर ऐसे युवाओं की एक बड़ी तादाद है, जो वोट देने की जरूरी उम्र के कई वर्षों बाद तक चुनावी प्रक्रिया से दूर रहती है। युवाओं का नाम मतदाता सूची में जोड़ने का अभियान मैंने इसीलिए शुरू किया था, क्योंकि मैंने महसूस किया है कि अधिकतर युवा मतदाता पंजीकरण के वक्त जरूरत से ज्यादा सुस्त हो जाते हैं। और इनमें से ज्यादातर 24-25 वर्ष की उम्र तक पहुंचने के बावजूद अपने लोकतांत्रिक हथियार से वंचित रहते हैं।

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और जो लोग पंजीकरण कराते भी हैं, उनमें से अधिकांश लोग सिर्फ वोटर पहचान पत्र पाना चाहते हैं, ताकि उसका प्रयोग दूसरे प्रयोजनों में किया जा सके। मैं बंगलूरू में रहने वाला एक सॉफ्टवेयर पेशेवर हूं, लेकिन फिलहाल मैं सॉफ्टवेयर की दुनिया से दूर होकर लोकतंत्र के एजेंट की भूमिका निभा रहा हूं। मैं तमाम डिग्री कॉलेजों में जाता हूं और वहां नवयुवकों को उनकी लोकतांत्रिक भूमिका के प्रति जागरूक करने के साथ उन्हें मतदाता सूची में शामिल कराने के सारे जतन भी करता हूं।

दरअसल आज के तेज-तर्रार युवा सुस्त सरकारी व्यवस्था से तालमेल नहीं बिठा पाते। फिर चाहे वह आवेदन पत्र भरना हो या जरूरी दस्तावेजों के साथ उसे सरकारी दफ्तर तक पहुंचाने की बात हो, उनके लिए यह काम बिल्कुल रुचिकर नहीं होता। इस काम की प्रेरणा मुझे दिसंबर, 2009 में इंफोसिस के सह-संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति की एक वार्ता से मिली। तब उन्होंने सही लोगों का चयन करने के लिए वोटिंग के महत्व पर प्रकाश डाला था।

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उसके कुछ महीने बाद मैंने दक्षिण बंगलूरू में एपीएस कॉलेज में अपने काम की शुरुआत की, जहां मैंने डिग्री छात्रों को मतदाता पंजीकरण की जरूरत के बारे में बताया। मैं उस वक्त एक आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर काम कर रहा था। लेकिन वह पेशा मुझे इस नए काम की बहुत ज्यादा इजाजत नहीं देता था। नतीजतन मैं नौकरी छोड़कर पूरी तरह से मतदाता पंजीकरण अभियान में जुट गया।

आगे चलकर मैं दो स्टार्ट-अप संस्थाओं से जुड़ गया, जो इसी तरह समाज सेवा में जुटी थीं। मैंने युवाओं को जागरूक करने के इरादे से अनेक वीडियो, एप्लीकेशन और वेब पोर्टल भी बनाए हैं, ताकि पंजीकृत मतदाता अपने वार्ड और विधानसभा क्षेत्रों का पता लगा सकें। मेरा मानना है कि नए मतदाता पंजीकरण कराने के लिए चुनाव आयोग को और अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। मैं फिलहाल केवल डिग्री कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों पर केंद्रित हूं, क्योंकि मेरी भी कुछ सीमाएं हैं।

फिर भी मैंने करीब तीस हजार युवाओं का नाम मतदाता सूची में शामिल कराने में अपनी भूमिका निभाई है। कल्पना कीजिए कि यदि सभी मेडिकल, इंजीनियरिंग, विधि और नर्सिंग कॉलेजों में पढ़ने वाले युवाओं तक पहुंचा जाए, तो संख्या क्या होगी? चुनाव आयोग द्वारा अनेक कार्यक्रम चलाने के बावजूद युवाओं के बीच जागरूकता की कमी ही इस समस्या की जड़ है। इसके अलावा कई छात्र अधूरे डाटा या गलत दस्तावेजों के साथ फॉर्म जमा करते हैं, जिसके कारण उनके आवेदन अस्वीकृत हो जाते हैं। कई लोगों के लिए चुनाव का दिन महज एक छुट्टी का दिन होता है। मेरा प्रयास युवाओं के नाम मतदाता सूची में पंजीकृत करते हुए चुनावी छुट्टी और उनकी जिम्मेदारी के बीच के अंतर को भरना भी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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