उसके कुछ महीने बाद मैंने दक्षिण बंगलूरू में एपीएस कॉलेज में अपने काम की शुरुआत की, जहां मैंने डिग्री छात्रों को मतदाता पंजीकरण की जरूरत के बारे में बताया। मैं उस वक्त एक आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर काम कर रहा था। लेकिन वह पेशा मुझे इस नए काम की बहुत ज्यादा इजाजत नहीं देता था। नतीजतन मैं नौकरी छोड़कर पूरी तरह से मतदाता पंजीकरण अभियान में जुट गया।
आगे चलकर मैं दो स्टार्ट-अप संस्थाओं से जुड़ गया, जो इसी तरह समाज सेवा में जुटी थीं। मैंने युवाओं को जागरूक करने के इरादे से अनेक वीडियो, एप्लीकेशन और वेब पोर्टल भी बनाए हैं, ताकि पंजीकृत मतदाता अपने वार्ड और विधानसभा क्षेत्रों का पता लगा सकें। मेरा मानना है कि नए मतदाता पंजीकरण कराने के लिए चुनाव आयोग को और अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। मैं फिलहाल केवल डिग्री कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों पर केंद्रित हूं, क्योंकि मेरी भी कुछ सीमाएं हैं।
फिर भी मैंने करीब तीस हजार युवाओं का नाम मतदाता सूची में शामिल कराने में अपनी भूमिका निभाई है। कल्पना कीजिए कि यदि सभी मेडिकल, इंजीनियरिंग, विधि और नर्सिंग कॉलेजों में पढ़ने वाले युवाओं तक पहुंचा जाए, तो संख्या क्या होगी? चुनाव आयोग द्वारा अनेक कार्यक्रम चलाने के बावजूद युवाओं के बीच जागरूकता की कमी ही इस समस्या की जड़ है। इसके अलावा कई छात्र अधूरे डाटा या गलत दस्तावेजों के साथ फॉर्म जमा करते हैं, जिसके कारण उनके आवेदन अस्वीकृत हो जाते हैं। कई लोगों के लिए चुनाव का दिन महज एक छुट्टी का दिन होता है। मेरा प्रयास युवाओं के नाम मतदाता सूची में पंजीकृत करते हुए चुनावी छुट्टी और उनकी जिम्मेदारी के बीच के अंतर को भरना भी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।