उस दिन मैं उसी ब्यूटी पार्लर में गई हुई थी, जहां मैं अक्सर जाया करती थी। पार्लर में लोग ज्यादा थे, सो मैं बैठकर अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। इसी दौरान अचानक मेरी नजर पार्लर के बाहर एक अजीब-सी आंखों वाली आठ-नौ साल की बच्ची पर पड़ी।
उसकी आंखें सामान्य से बहुत बड़ी थी, बिल्कुल उसी तरह, जैसे फिल्मों में एलियन की आंखें दिखाई जाती हैं। मैं उस बच्ची के पास गई। उससे बातें की। पता चला कि उसकी आंखें बचपन से ही ऐसी हैं।
शैली (उस बच्ची) ने बताया कि उसके पापा एक सुरक्षा गार्ड हैं और उसके परिवार में कुल पांच लोग हैं। आमदनी कम होने के कारण उसके पिता चाहते हुए भी उसका इलाज करवा पाने में अक्षम थे। असामान्य आंखों के कारण शैली स्कूल भी नहीं जा पा रही थी।
शैली को देखकर लगा कि मुझे उसकी मदद करनी चाहिए। मैं उसे अस्पताल ले गई। डॉक्टर को दिखाया, तो वह भी बीमारी के बारे में सही से नहीं बता पाए।
बाद में एक दूसरे डॉक्टर ने मुझे बताया कि शैली को करोजन सिंड्रोम नाम की बीमारी है। मैंने भी इस बीमारी के बारे में पहले नहीं सुना था। खोजबीन की, तो पता चला कि इस बीमारी में इंसान की आंखों का ढांचा छोटा रह जाता है, जिससे आंखें बाहर निकल आती है।
भारत में गिने-चुने डॉक्टर ही इसका इलाज कर सकते हैं और इस पर खर्च आता है लगभग तीस लाख रुपये। मैं शैली की सच में मदद करना चाहती थी, लेकिन इलाज का खर्च जानकर मेरी सारी दरियादिली एकदम से गायब होने लगी।
एक तीस साल की युवती, जिसका कोई भाई न हो और उस पर दो छोटी बहनों की शादी की भी जिम्मेदारी हो, तीस लाख रुपये उसकी कल्पनाओं से बाहर एक बड़ी रकम थी।
मुझे समझ में आ गया कि आखिर क्यों शैली के घरवाले उसका इलाज करवाने के बारे में नहीं सोच रहे थे। फिर भी मैं किसी तरह शैली की मदद करना चाहती थी।
कई दिनों तक लगातार किसी तरकीब के बारे में सोचती रही। मैंने समाजसेवा करने वाली संस्थाओं से मदद लेने की सोची। पटना से लेकर मुंबई तक की कुछ संस्थाओं से मैंने संपर्क किया। मेरा प्रयास सफल हुआ।
मुंबई में अभिनेता सलमान खान की संस्था बीईंग ह्यूमन की ओर से जवाब आया कि वह शैली के इलाज के लिए तैयार हैं। मैं शैली को लेकर बंगलूरू गई, जहां उसकी आंखों का सफल ऑपरेशन हुआ।
यह पूरा वाकया जब लोगों के बीच पहुंचा, तो कई दूसरे अभिभावकों ने अपने बच्चों के इलाज के लिए मुझसे संपर्क किया। इन गतिविधियों से मेरा व्यक्तिगत जीवन प्रभावित हो रहा था। एकबारगी मैंने यह भी सोच लिया था कि अब मैं दोबारा अपनी जिंदगी में लौट आऊंगी।
लेकिन लोगों द्वारा भेजे गए उनके बच्चों की तस्वीरें देख मेरा दिल पसीज आया। आखिरकार मैंने इन विशेष बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया। और इस तरह एक घटना से मेरी जिंदगी की गाड़ी एक बहुत ही बेहतर और संतुष्टि भरे रास्ते की ओर मुड़ गई।
ठीक होने के बाद शैली ने अपने हाथ पर मेरे नाम का टैटू बनावाया। उसे लगता है कि उसकी जिंदगी में मेरी वजह से खुशियां आई हैं, मगर हकीकत यह है कि शैली की वजह से मेरी जिंदगी के मायने बदल गए और मुझे मालूम हुआ कि दूसरों के लिए जीना ही असल में जिंदगी है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।