पूरी दुनिया में आज श्रीकृष्ण के जन्म की धूम मची हुई है। लोग श्रीकृष्ण के मंदिरों में दूर-दूर से जाकर पूजन अर्चन कर रहे हैं। ऐसा ही एक मंदिर मध्य प्रदेश के वनांचल क्षेत्र के उमरिया में है जो सिर्फ साल में एक बार ही खुलता है। इस मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। प्रशासन की निगरानी यहां बनी रहती है, क्योंकि यह मंदिर पूरी तरह से जंगल के बीच है।
बता दें कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व क्षेत्र के अंतर्गत यह पूरा मंदिर आता है। यहां आठ किलोमीटर दूर पैदल सफर करने के बाद लोग मंदिर तक पहुंच पाते हैं और भगवान का दर्शन करते हैं। इसके साथ ही साथ है जंगली जीवों का यहां खतरा लगातार मारता रहता है, क्योंकि यहां शेर, हाथी, चीते, बाघ से लेकर सांप सभी तरह के जीव-जंतु पाये जाते हैं। इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है।
बाघ करते हैं मंदिर की सुरक्षा
यही इस आसपास के गांव के लोग कहते हैं कि इस मंदिर की सुरक्षा खुद बाघों के द्वारा की जाती है। यहां एक नहीं दो नहीं बल्कि 40 से अधिक संख्या में बाघ हैं जोकि मंदिर के आसपास हमेशा घूमते रहते हैं। इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। भगवान बांधवधीस के सेवक के रूप में उन्हें गिना जाता है।
जन्माष्टमी पर होता है भव्य मेले का आयोजन
इतना ही नहीं बल्कि यहां श्री कृष्ण जन्माष्टमी की अवसर पर भव्य मेरे का आयोजन किया जाता है। यहां आज के दिन बांधवगढ़ नेशनल पार्क के गेट भक्तों के लिए पूरी तरह से खोल दिए जाते हैं। भक्तगण लगभग 8 किलोमीटर की ट्रैकिंग करके पैदल चलकर किले के पास पहुंचते थे। यहां इस किले के अंदर राम जानकी मंदिर है, जिसमें भगवान के दर्शन करने भक्त पहुंचते हैं।
शिवपुराण में भी मिलता है किले का जिक्र
वहीं कुछ इतिहासकारों और धार्मिक जानकारों यह बताते हैं कि बांधवगढ़ का ये किला लगभग दो हजार साल पहले बनाया गया था। इसका जिक्र भी शिवपुराण में भी मिलता है। जहां इस किले को रीवा के राजा विक्रमादित्य सिंह ने बनवाया था। किले में जाने के लिए केवल एक ही रास्ता है, जोकि बांधवगढ़ नेशनल पार्क के घने जंगलों से होकर ही गुजरता है।
किले की लोककथा
इस किले को लेकर एक लोककथा भी प्रचलित है। कहते हैं कि इस किले के नाम के पीछे भी पौराणिक गाथा है। जनश्रुति है कि भगवान राम ने वनवास से लौटने के बाद अपने भाई लक्ष्मण को ये किला भेंट किया था। पुराण और शिव संहिता में भी इस किले का वर्णन भी मिलता है। बांधवगढ़ की जन्माष्टमी सदियों से भी पुरानी है। पहले ये रीवा रियासत की राजधानी हुआ करती थी। तभी से यहां जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया जाता रहा है। आज भी इस इलाके के लोग उस परंपरा का भी पालन कर रहे हैं।
भगवान विष्णु की अद्भुत शेषनाग सैया की मूर्ति
यहां बांधवाधीश मंदिर जाने पर पहला पड़ाव तब मिलता जब शेष शैय्या मिलती है। जहां भगवान विष्णु की अद्भुत मूर्ति के लोगों के दर्शन होते हैं। इसे देखकर हर कोई व्यक्ति अचंभित हो जाता है। यहां भगवान विष्णु की लेटी हुई विशाल पत्थर की अद्भुत मूर्ति विराजमान है, जिसे लोग शेषसैया के नाम से जानते हैं और लोग इसके दर्शन का लाभ लेने के लिए भी उस दिन पहुंचते हैं। शेषसैया के पास ही एक छोटा सा कुंड भी दिखाई देता है। जहां से ठंडा पानी अविरल बहता रहता है। यहां पर साल भर पानी की एक अविरल धारा उनके पैर से आती है और तालाब में एकत्रित होती है। यहां पर कई विशाल दरवाजे स्थित हैं, जिनका निर्माण भी किले की सुरक्षा के लिए किया गया था। यहां इन दरवाजों को पार करने के बाद ही श्रद्धालु राम जानकी मंदिर पर पहुंचते हैं।