बांधवगढ़ के शावक फिर बनाएंगे इतिहास, मध्यप्रदेश को दोबारा दिलाएंगे टाइगर स्टेट की बादशाहत
मप्र में रही थी 49 प्रतिशत वृद्धि
अगर पूरे देश की बात करें तो भारत सरकार द्वारा कराई गई 2022 की बाघ गणना के अनुसार देश में कुल 3,682 बाघ पाए गए थे। इनमें से सबसे ज्यादा 785 बाघ अकेले मध्यप्रदेश में दर्ज किए गए थे। खास बात यह है कि 2018 से 2022 के बीच देशभर में बाघों की संख्या में लगभग 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि मध्यप्रदेश में यह वृद्धि करीब 49 प्रतिशत तक रही। यह आंकड़ा बताता है कि बाघों के संरक्षण और प्रबंधन में मध्यप्रदेश देश में सबसे आगे है।
हर 10 वर्ग किलोमीटर में एक बाघ
बांधवगढ़ की खासियत केवल बाघों की संख्या नहीं, बल्कि उनका घनत्व भी है। यहां लगभग हर 10 वर्ग किलोमीटर में एक बाघ पाया जाता है। यही कारण है कि यहां सफारी के दौरान बाघ दिखने की संभावना बेहद ज्यादा रहती है। कई बार बाघ रिजर्व से बाहर निकलकर आसपास के जंगलों में भी नजर आते हैं, जो इस बात का संकेत है कि यहां बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
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आपसी टकराव भी बढ़ा
हालांकि, बढ़ती संख्या के साथ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। जंगल का क्षेत्रफल सीमित है और बाघ स्वभाव से अपनी टेरिटरी को लेकर बेहद संवेदनशील होते हैं। एक बाघ दूसरे बाघ को अपने इलाके में बर्दाश्त नहीं करता। इसी वजह से कई बार आपसी संघर्ष देखने को मिलता है। बीते कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें टेरिटरी की लड़ाई में बाघों और शावकों की मौत भी हुई है।
जनवरी में चार बाघों की मौत
साल 2026 की शुरुआत भी बांधवगढ़ के लिए चिंता लेकर आई। जनवरी महीने में ही चार बाघों की मौत ने वन्यप्रेमियों को परेशान कर दिया। इनमें कुछ मौतें आपसी द्वंद के कारण हुईं, जबकि एक बाघ शिकार के दौरान कुएं में गिर गया। एक बाघिन की मौत सोलर फेंसिंग में फंसने से हुई, जब वह नया इलाका तलाश करते हुए रिजर्व से बाहर निकल गई थी। ये घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि बढ़ती बाघ संख्या के साथ उनके लिए नए सुरक्षित आवास की जरूरत भी बढ़ रही है।
क्षेत्रफल को और बढ़ाने की जरूरत
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व लगभग 1536 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें 716 वर्ग किलोमीटर कोर जोन और 820 वर्ग किलोमीटर बफर जोन शामिल है। इसे वर्ष 1968 में नेशनल पार्क का दर्जा मिला था, तब इसका क्षेत्रफल मात्र 105 वर्ग किलोमीटर था। समय के साथ इसका विस्तार हुआ, लेकिन अब विशेषज्ञ मानते हैं कि बाघों की बढ़ती आबादी को देखते हुए इसके क्षेत्रफल को और बढ़ाने की जरूरत है।
मध्यप्रदेश के लिए एक बड़ी उम्मीद
बांधवगढ़ का इतिहास भी बेहद खास है। यह सफेद बाघ की जन्मस्थली के रूप में भी जाना जाता है। वर्ष 1951 में यहीं से मोहन नाम का पहला सफेद बाघ शावक मिला था, जिसके वंशज आज दुनिया भर के चिड़ियाघरों में मौजूद हैं। कुल मिलाकर, बांधवगढ़ के जंगलों में खेलते ये शावक केवल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र नहीं हैं, बल्कि मध्यप्रदेश के लिए एक बड़ी उम्मीद भी हैं। अगर संरक्षण और प्रबंधन इसी तरह मजबूत रहा, तो आने वाले समय में यही शावक मध्यप्रदेश को एक बार फिर टाइगर स्टेट की बादशाहत दिलाने वाले साबित होंगे।