कल्पना कीजिए कि आप अपने पसंदीदा सोशल मीडिया एप्प पर ‘स्क्रॉल’ कर रहे हैं। आपके कथित ऑनलाइन फ्रेंड्स की पोस्ट पर लगातार ‘कमेंट’ आ रहे हैं, आप हर कमेंट को देख रहे हैं पर आपके भीतर एक प्रश्न गूंज रहा है - "मेरी पोस्ट पर तो कोई लाइक या कमेंट नहीं आया... तो क्या हमेशा ऐसा ही रहेगा?" हम लक्ष्यों के पीछे भागते हैं, सभी से प्रशंसा और मान्यता चाहते हैं, और अगर मिल भी जाए, तो भी, एक असंतोष अक्सर बना रहता है।
ऐसे में ऋग्वेद का कालातीत सिद्धांत, जिसकी स्वामी विवेकानंद अक्सर चर्चा करते थे - "आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च" - आत्म-मुक्ति और दुनिया के कल्याण की खोज - एक अद्भुत सीख प्रदान करता है। यह एक अनुस्मारक है कि सच्ची संतुष्टि हमारे भीतर की खोज को दूसरों की सेवा के लिए समर्पित कार्यों के साथ संतुलित करने में निहित है, और यह सामंजस्य ऐसा हो कि एक स्वयं और समाज दोनों को बदल दे। आत्म-मुक्ति और सेवा का दोहरा मार्ग स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं पर केन्द्रित सिद्धांत है जो आध्यात्मिक विकास और नि:स्वार्थ सेवा के दोहरे उद्देश्यों को संतुलित करता है। यह ज्ञान की आंतरिक खोज को करुणा की बाहरी अभिव्यक्ति के साथ जोड़ता है। यह केवल एक दार्शनिक कथन नहीं है, बल्कि उद्देश्य और सद्भाव में निहित जीवन के लिए उचित कार्य करने का आह्वान है।
यह वाक्यांश प्राचीन भारतीय दर्शन, विशेष रूप से वेदांत परंपरा के सार को दर्शाता है, जो मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य, मोक्ष पर जोर देता है- जन्म और मृत्यु (संसार) के चक्र से मुक्ति। स्वामी विवेकानंद ने ‘जगत हिताय’, अर्थात दुनिया के कल्याण के आयाम को जोड़कर इसके दायरे का और भी अधिक विस्तार किया। यह एकीकरण आत्म-साक्षात्कार और परोपकारिता के एक सहज संश्लेषण को दर्शाता है। कई मायनों में, यह सिद्धांत भगवद्गीता की भी प्रतिध्वनि है, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को नि:स्वार्थ कर्म (कर्म योग) में संलग्न होने की सलाह देते हैं, जो श्रम के फल से पृथक हो। ‘व्यक्तिगत’ को ‘सामूहिक’ बनाकर, स्वामी विवेकानंद ने इस बात पर जोर दिया कि सच्ची आध्यात्मिकता दुनिया से पलायन नहीं बल्कि प्रेम और सेवा में निहित इसके साथ सक्रिय जुड़ाव है।
आत्म-मुक्ति की खोज भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं की आधारशिला रही है। मोक्ष अज्ञान (अविद्या), अहंकार (अहं) और आसक्ति (राग) से मुक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। स्वामी विवेकानंद ने बताया कि प्रत्येक व्यक्ति में अपनी दिव्य प्रकृति को महसूस करने की क्षमता है। प्रत्येक आत्मा संभावित रूप से दिव्य है। लक्ष्य बाहरी और आंतरिक प्रकृति को नियंत्रित करके इस दिव्यता को प्रकट करना है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह यात्रा कार्ल जंग की व्यक्तित्व की अवधारणा के साथ संरेखित होती है, जो स्व को अनुभव करने के लिए मानस के चेतन और अचेतन पहलुओं को एकीकृत करने की प्रक्रिया है। जिस प्रकार वेदांत अहंकार से पृथक आत्मा (सच्चे स्व) की प्राप्ति की शिक्षा देता है, उसी प्रकार यह हमारी पहचान की सतही परतों से ऊपर उठकर अस्तित्व के गहन, एकीकृत मूल को उजागर करने का प्रयास करता है। आधुनिक मनोविज्ञान मानसिक स्वास्थ्य के लिए परोपकारिता के महत्व को पहचानता है। अध्ययनों से पता चलता है कि दयालुता और सेवा के कार्य ऑक्सीटोसिन, "स्नेह का हार्मोन" जारी करते हैं, जो जुड़ाव की भावनाओं को बढ़ावा देते हैं और तनाव को कम करते हैं। इसी तरह, आत्म-चिंतन और ध्यान का अभ्यास भावनात्मक विनियमन और आत्म-जागरूकता को बढ़ाता है। तंत्रिका विज्ञान में हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि आध्यात्मिक अभ्यास और परोपकारी व्यवहार मस्तिष्क के समान क्षेत्रों को सक्रिय करते हैं, विशेष रूप से प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो सहानुभूति, निर्णय लेने और आत्म-नियमन से जुड़ा होता है।
व्यावहारिक रूप से, ‘आत्मनो मोक्षार्थं’ आत्मनिरीक्षण, ध्यान और आत्म-अनुशासन को प्रोत्साहित करता है। यह मन की शुद्धि और धैर्य, विनम्रता और वैराग्य जैसे गुणों का विकास करने का आह्वान है जो जीवन की क्षणभंगुर प्रकृति को समझने और खुद को उस परम शक्ति के साथ जोड़ने के बारे में है। तो एक ओर जहां आंतरिक यात्रा आत्म-साक्षात्कार पर केंद्रित है, बाहरी यात्रा, अर्थात ‘जगत हिताय च’, निस्वार्थ सेवा पर जोर देता है। स्वामी विवेकानंद के अनुसार, अपने भीतर दिव्य की प्राप्ति स्वाभाविक रूप से दूसरों में दिव्य की पहचान की ओर ले जाती है। यह समझ करुणा, सहानुभूति और सेवा का आधार बनती है। उन्होंने अक्सर भगवद्गीता में वर्णित “यः पश्यति स पश्यति” घोषणा को उद्धृत किया – जिसका अर्थ था "जो परमात्मा को सभी जीवों में आत्मा के साथ देखता है और जो इस नश्वर शरीर में दोनों को अविनाशी समझता है, केवल वही वास्तव में समझता है ।" यह परस्पर जुड़ाव दूसरों की सेवा को न केवल एक नैतिक जिम्मेदारी बल्कि एक आध्यात्मिक अभ्यास बनाता है। विश्व का कल्याण (जगत हिताय) ब्रह्मांड के साथ एकता की अभिव्यक्ति बन जाता है।
आज निश्चित रूप से व्यक्तिवाद और भौतिकवाद हावी है। ऐसे में विवेकानंद का यह सिद्धांत एक प्रतिवाद के रूप में कार्य करता है। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, पारिस्थितिक क्षरण और सामाजिक ध्रुवीकरण का उदय, आंशिक रूप से, खुद से और दूसरों से अलगाव से उपजा है। उदाहरण के लिए, राजा जनक के जीवन की एक कहानी, जिसे राजर्षि (ऋषि-राजा) के रूप में जाना जाता है, इस सिद्धांत को खूबसूरती से दर्शाती है। अपने राज्य के प्रशासन में गहराई से लगे होने के बावजूद, जनक आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध रहे। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने अपने आध्यात्मिक और सांसारिक कर्तव्यों को कैसे संतुलित किया, तो उन्होंने जवाब दिया: "मैं सिंहासन पर बैठूं या जंगल में ध्यान करूं, मैं समान रूप से शांत रहता हूं क्योंकि मुझे दोनों के बीच कोई अंतर नहीं दिखता।" जनक का जीवन दर्शाता है कि आध्यात्मिक विकास और सांसारिक जुड़ाव एक दूसरे के पूरक हैं। कुंजी अपने कर्तव्यों को अनासक्ति और सेवा की भावना के साथ निभाने में निहित है।
विवेकानंद का सिद्धांत दूसरों की भलाई में योगदान कर उनका भी उत्थान करता है। स्वामी विवेकानंद ने स्वयं अपने पूरे जीवन में इस सिद्धांत को अपनाया। वेदांतिक शिक्षाओं को प्रचलित करने और वंचितों के उत्थान के लिए उनका अथक समर्पण ‘जगत हिताय’ के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। साथ ही, उनके आध्यात्मिक अनुशासन ने ‘आत्मनो मोक्षार्थं’ को प्रदर्शित किया।
उनके सबसे प्रेरक कथनों में से एक है: "केवल वे ही जीवित रहते हैं जो दूसरों के लिए जीते हैं; बाकी लोग जीवित रहने से ज़्यादा मृत हैं।" अपने जीवन और शिक्षाओं के माध्यम से, उन्होंने प्रदर्शित किया कि आध्यात्मिक बोध को मानवता के उत्थान के लिए व्यावहारिक कार्रवाई में परिणत होना चाहिए। इसके अलावा, यूडेमोनिया की अवधारणा, जो अरस्तू के दर्शन में निहित है और आधुनिक सकारात्मक मनोविज्ञान में प्रतिध्वनित होती है, ‘आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च’ के साथ संरेखित होती है। यूडेमोनिया अच्छे मन की स्थिति या अवस्था है, और जिसे सामान्यतः खुशी या कल्याण के रूप में अनुवादित किया जाता है। यह सद्गुण, उद्देश्य और सार्थक जुड़ाव के माध्यम से समृद्ध जीवन को संदर्भित करता है, जो विवेकानंद के संतुलित जीवन के दृष्टिकोण के साथ प्रतिध्वनित होता है। सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक और बाहरी यात्राओं के बीच संतुलन बनाने में है। आत्म-मुक्ति पर बहुत अधिक ध्यान आध्यात्मिक पलायनवाद की ओर ले जा सकता है, जबकि सेवा पर अत्यधिक ध्यान तन्द्रा का कारण बन सकता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली ‘स्थितप्रज्ञ’ की अवधारणा में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है: "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत", अर्थात उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
भिन्न विचारधाराओं और स्वार्थ से विभाजित दुनिया में, ‘आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च’ सद्भाव के लिए एक प्रेरणा है। जिस प्रकार एक मोमबत्ती स्वयं जल कर अपनी लौ से न सिर्फ स्वयं को बल्कि अपने आस-पास के वातावरण को रोशन करती है, उसी प्रकार स्वामी विवेकानंद से प्रेरित हो कर हम भी एक ऐसा जीवन जियें जो आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश से प्रेरित होकर सभी के कल्याण के लिए चमक सके।
(लेखक आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं।)