होली पर्व के नजदीक आते ही आदिवासियों में भगोरिया हाट को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। हाट में ढोल, मांदल, बांसुरी की धुन पर बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी जोश और जुनून के साथ थिरकने को तैयार हैं। भगोरिया मेला सप्ताहभर तक चलेगा। जिले में भगोरिया हाट 8 मार्च से 13 मार्च तक 15 स्थानों पर सजेगा।
बारेला समाज के लोगों के अनुसार, हाट की तैयारी रबी फसल के पकने के साथ ही शुरू हो जाती है। इसे फसली उत्सव हाट भी कहा जाता है, क्योंकि यह आदिवासियों की प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। फसल का उत्पादन जितना अच्छा होता है, उतना ही अधिक उत्साह और उमंग इस हाट में देखने को मिलता है।
यह हाट आदिवासी संस्कृति की पहचान है। इसमें दूर-दूर से आदिवासी पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों जैसे ढोल, मांदल, बांसुरी के साथ शामिल होते हैं। वे उत्साहपूर्वक लय-ताल में नाचते-गाते नजर आते हैं। इस हाट की तैयारियां एक माह पहले ही शुरू हो जाती हैं। शाम ढलते ही गांवों में ढोल, मांदल, बांसुरी की धुन गूंजने लगती है, जिससे बच्चे, बुजुर्ग और युवा एक ही बात दोहराते हैं-भगोरिया आने वाला है।
गुलाल और पान खिलाकर मनाते हैं खुशियां
आदिवासी वित्त विकास निगम की अध्यक्ष निर्मला बारेला ने बताया कि भगोरिया हाट में दूर-दूर से आए रिश्तेदार, सगे-संबंधी और दोस्त मिलते हैं। इस मुलाकात को यादगार बनाने के लिए वे एक-दूसरे को पान बीड़ा खिलाते हैं और गुलाल लगाकर खुशी मनाते हैं। यह पुरानी परंपरा है। बारेला के मुताबिक, भगोरिया हाट की शुरुआत दो भील राजाओं, कासूमार और बालून ने की थी। उन्होंने अपनी राजधानी भगोर में मेले का आयोजन शुरू किया, जिसे धीरे-धीरे आसपास के भील राजाओं ने भी अपनाया। इससे हाट और मेलों को पहले भौंगरिया कहा जाने लगा, जो समय के साथ बदलकर भगोरिया हाट बन गया।
जिले में कहां लगेंगे भगोरिया हाट
8 मार्च (शनिवार): ब्रिजिशनगर (पिपलठोन), आमलापानी
9 मार्च (रविवार): लाड़कुई, कोलारडेम, बिलकिसगंज (झागरिया)
10 मार्च (सोमवार): पिपलानी, नादान, पांगरी
11 मार्च (मंगलवार): चकल्दी, हमीदगंज
12 मार्च (बुधवार): लालमाटी, बावड़ियाचोर
13 मार्च (गुरुवार): मंजाखेड़ी, सनकोटा, जीवनताल