डिस्पोजल कपों ने बदल दी महिला की जिंदगी
- फोटो : अमर उजाला
अक्सर लोग चाय या पानी पीने के बाद डिस्पोजल कपों को बेकार समझकर फेंक देते हैं। यही कचरा आसपास गंदगी फैलाने के साथ पर्यावरण के लिए भी बड़ी समस्या बन जाता है। लेकिन मध्य प्रदेश के सागर जिले की एक महिला ने इन्हीं फेंके गए डिस्पोजल कपों को कमाई का जरिया बना दिया। सागर जिले के कनेरा गोंड गांव की रहने वाली भागबाई पटेल ने इस्तेमाल किए हुए डिस्पोजल कपों में पौधे तैयार कर अनोखी नर्सरी शुरू की है। यह पहल न सिर्फ उनके परिवार की आय बढ़ा रही है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और कचरा प्रबंधन की भी मिसाल बन गई है।
पारिवारिक कार्यक्रम के बाद आया अनोखा आइडिया
भागबाई के पति बाबूलाल पटेल ने बताया कि करीब दो साल पहले उनके घर में एक पारिवारिक कार्यक्रम हुआ था। कार्यक्रम खत्म होने के बाद घर और आसपास बड़ी संख्या में डिस्पोजल कप पड़े थे। आमतौर पर इन्हें कचरे में फेंक दिया जाता है, लेकिन उन्हें इन्हीं कपों में पौधे उगाने का विचार आया। इसके बाद उन्होंने डिस्पोजल कपों में मिट्टी भरकर पौधे लगाए। नेट हाउस के नियंत्रित वातावरण में पौधों की अच्छी बढ़त हुई और करीब एक महीने में पौधे पूरी तरह तैयार हो गए। इस सफल प्रयोग के बाद दोनों ने इसे व्यवसाय का रूप देने का फैसला किया।
काम करती महिलाएं
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दो महीने में 30 हजार रुपये का मुनाफा
प्रयोग सफल होने के बाद भागबाई और बाबूलाल ने डिस्पोजल कपों में पौधे तैयार करने की व्यावसायिक नर्सरी शुरू कर दी। खरीफ सीजन के दौरान महज दो महीनों में उन्हें करीब 30 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। भागबाई का कहना है कि यदि पूरे साल इसी तरह व्यवस्थित तरीके से काम किया जाए तो सालाना आय आसानी से एक लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
मुफ्त का कच्चा माल, पर्यावरण को भी फायदा
इस नर्सरी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका कच्चा माल बिल्कुल मुफ्त में मिल जाता है। भागबाई घरों के आसपास और चाय की दुकानों से इस्तेमाल किए गए डिस्पोजल कप इकट्ठा करती हैं। चाय के लिए इस्तेमाल होने वाले अधिकांश डिस्पोजल कप कागज के बने होते हैं। पौधे तैयार होने के बाद इन्हें कप सहित ही खेत या जमीन में लगाया जाता है। इससे कप को अलग निकालने की जरूरत नहीं पड़ती। कागज का कप समय के साथ मिट्टी में गल जाता है। इससे पॉलीथिन खरीदने का खर्च बचता है और प्लास्टिक प्रदूषण भी नहीं फैलता।
डिस्पोजल कपों में तैयार की नर्सरी
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अन्य महिलाओं को भी बना रहीं आत्मनिर्भर
भागबाई केवल खुद ही यह काम नहीं कर रहीं, बल्कि आसपास की ग्रामीण महिलाओं को भी इस काम का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनकी नर्सरी में वर्तमान में गेंदा, टमाटर, मिर्च, शिमला मिर्च, पपीता और अमरूद सहित कई प्रकार के पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
कचरा प्रबंधन और स्वरोजगार की बनी मिसाल
भागबाई पटेल की यह अनोखी पहल बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में कचरा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और स्वरोजगार का सफल मॉडल बनकर सामने आई है। जिस डिस्पोजल कप को लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं, उसी ने आज एक परिवार की आय बढ़ाने के साथ कई महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता खोल दिया है।