फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Ramadan: खास है भोपाल की ये पहचान, मस्जिदों के नाम नवाबों की बेगमों पर, सबसे छोटी मस्जिद भी यहां

Wed, 20 Mar 2024 10:42 AM IST
उदित दीक्षित न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

Ramadan: भोपाल में ज्यादातर मस्जिदों के नाम तत्कालीन नवाब बेगमों के नाम पर रखे गए, जो आज भी इन्हीं नामों से पहचानी जाती हैं। इसी तरह भोपाल की मस्जिदों के नाम में फल, फूल और पेड़ पौधों के नामों को भी तरजीह दी गई।
विज्ञापन
खास है भोपाल की यह ढाई सीढ़ी मस्जिद। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

Ramadan: मध्यप्रदेश का भोपाल शहर अपनी कई खासियतों और विशेषताओं के साथ देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है। सबसे ज्यादा झीलों को अपनी छाती पर बसाए रखने का गौरव तो इस शहर के हिस्से है ही। साथ ही मस्जिदों की बड़ी तादाद भी इस शहर को एक अलग मुकाम देती है। अल सुबह सूर्य किरणें निकलने से पहले फिजाओं में गूंजने वाली अजानों की आवाजें यहां आने वाले हर शख्स को सुखद अहसास लेकर वापस लौटाता है। मस्जिदों की देखरेख के लिए अलग से स्थापित एक सरकारी महकमा भी संभवतः पूरे भारत में इकलौता भोपाल में ही है।

विज्ञापन


नवाब शासन काल में शहर भोपाल में मस्जिदों की बड़ी तादाद में तामीर (निर्माण) हुआ। इनकी संख्या कमोबेश 600 से ऊपर आंकी जाती है। पुराने शहर की सीमा में हर कदम पर पाई जाने वाली एक मस्जिद से जहां नमाजियों के लिए आसानियां पैदा करती हैं, वहीं इन इलाकों के बाशिंदों को दीन से जोड़े रखने में भी मददगार साबित होती हैं।

विज्ञापन


नामों में कुछ खास
भोपाल में ज्यादातर मस्जिदों के नाम तत्कालीन नवाब बेगमों के नाम पर रखे गए, जो आज भी इन्हीं नामों से पहचानी जाती हैं। कुलसुम बिया मस्जिद, नन्हीं बी मस्जिद, मांजी साहिबा, जीनत उल मसाजिद आदि नामों के साथ शहर की मस्जिदों नारी शक्ति की धारणा को आगे बढ़ाती हैं। इसी तरह भोपाल की मस्जिदों के नाम में फल, फूल और पेड़ पौधों के नामों को भी तरजीह दी गई। जिसके चलते यहां की मस्जिदों को आम वाली मस्जिद, जामुन वाली मस्जिद, कबीट वाली मस्जिद, अरीठे वाली मस्जिद, बड़ वाली मस्जिद आदि के नाम से जाना जाता है।

बड़ी और सबसे छोटी मस्जिद यहां
शहर भोपाल में देश की बड़ी मस्जिदों में शुमार ताजुल मसाजिद भी मौजूद है। नवाब शासन काल के अंतिम दिनों के आसपास इसका निर्माण किया गया था। इसकी विशालता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनियाभर के जमातियों की मौजूदगी वाला आलमी तबलीगी इज्तिमा भी इसी मस्जिद में होता रहा है। इसके विपरीत एशिया की सबसे छोटी मस्जिद भी इसी शहर में है। ढाई सीढ़ी वाली मस्जिद के नाम से पहचानी जाने वाली यह मस्जिद दोस्त मोहम्मद खान ने 1726 में बनवाई थी। महल की सुरक्षा में तैनात सिपाहियों की इबादत की सहूलियत के लिहाज से इसका निर्माण कराया गया था।

हर वक्त अजान की गूंज
अल सुबह फजिर के वक्त से शुरू होने वाली अजान की आवाजें देर रात को होने वाली ईशा की नमाज के लिए होने वाली अजान तक सुनाई देती रहती हैं। शहर की मस्जिदों के प्रबंध समितियों द्वारा तय किए गए अलग-अलग वक्त के कारण लोगों को अपनी सहूलियत के हिसाब से नमाज अदा करना आसान हो जाता है। शाम को होने वाली मगरिब की अजान सूर्यास्त के साथ होती है। इसके चलते एकसाथ सभी मस्जिदों से एकसाथ होने वाली अजान की आवाजें हर तरफ पुर सुकून माहौल बना देती हैं।
विज्ञापन


मसाजिद कमेटी की इकलौती व्यवस्था
नवाब शासन काल के समापन के समय नवाब और शासन के बीच एक मर्जर एक्ट हुआ। बाकी समझौतों के साथ नवाबों ने भोपाल रियासत (भोपाल, रायसेन और सीहोर जिले) की मस्जिदों की व्यवस्था भी शासन को सौंपी। इसके आधार पर एक शासकीय एजेंसी मसाजिद कमेटी का गठन किया गया। सरकार द्वारा दिए जाने वाले सालाना मुआवजे से इस कमेटी का संचालन होता है। कमेटी तीनों जिलों की मस्जिदों की देखरेख और उनके इमाम और मुअज्जिन की तनख्वाह देने का काम करती है। इस तरह की कमेटी संभवतः देश में भोपाल में ही है। 

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें