हाल ही में राजगढ़ जिले की सारंगपुर तहसील के पढ़ाना गांव से ताल्लुक रखने वाले CBSCE AFFILIATED स्कूल के छात्र अम्मार अंसारी ने महाराष्ट्र के मालेगांव में स्कूली पढ़ाई को जारी रखते हुए हुए दीनी तालीम भी हासिल की और 3 साल की मेहनत के बाद उसने कुरान हिफ्ज कर लिया, जिसके बाद अम्मार को हाफ़िज़ ए कुरआन की उपाधि से भी नवाजा गया है। हाफिज ए कुरआन बनकर अम्मार, इंसानियानत का पैगाम दुनिया में आम करने के साथ-साथ वो एमबीबीएस एमएस की पढ़ाई कर डॉक्टर बनकर मरीजों की सेवा करना चाहते हैं।
दरअसल कुरआन इस्लाम मजहब की एक पवित्र किताब है, जिसमें इंसानों के लिए इंसानियत और जिंदगी गुजारने का पूरा तरीका मौजूद है, जिस पर अमल करने से इंसान परहेजगार (यानी की बुरी बातों और गुनाहों से खुद भी बचने और दूसरों को भी रोकने वाला) बन जाता है। 15 साल के अम्मार ने इसी पवित्र किताब को हिफ्ज़ यानी की मौखिक याद किया है। अब वो उस पर अमल करते हुए कुरआन के इंसानियत के पैगाम को आम और एमबीबीएस एमएस की तैयारी करते हुए डॉक्टर बनकर मरीजों की सेवा करना चाहता है।
सुबह पांच बजे उठकर की कुरआन की तिलावत
अम्मार अपने शेड्यूल के बारे में बताते है कि उन्होंने किस तरह से वक्त निकाला और ये मुकाम हासिल किया। अम्मार का कहना है कि वो रोज सुबह पांच बजे उठकर कुरआन की तिलावत करते और स्कूल का समय होने पर स्कूल चले जाते हैं। स्कूल से घर आकर एक घंटे आराम करने के बाद चार घंटे के लगभग वो मदरसे को देते और घर आकर स्कूल की पढ़ाई करते थे। उन्होंने सिक्स्थ क्लास से हाफिज ए कुरआन का कोर्स शुरू किया था जोकि नाइंथ क्लास में मुकम्मल हो गया। साथ ही अम्मार बताते हैं कि कुरआन इंसानियत के पैगाम से भरा हुआ है और इसे इंसानों की भलाई के लिए ही उतारा गया है। मेरा मकसद है कि में दीनी तालीम के साथ दुनियावी तालीम भी हासिल करू और डॉक्टर बनकर मरीजों की सेवा करूं।
हाफिज ए कुरआन का कोर्स बड़ी मेहनत से पूरा किया
अम्मार के पिता सादिक अंसारी बताते हैं कि अम्मार उनका सबसे छोटा बेटा है और उसकी दो बढ़ी बहने हैं, जिनका नाम सादिया और सालेहा अंसारी है। सालेहा 22 वर्ष की है जो BUMS थर्ड ईयर में डॉक्टर की पढ़ाई कर रही हैं और वो भी साथ में कुरआन हिफ्ज की तालीम भी हासिल कर रही हैं। वहीं सालेहा अंसारी 18 वर्ष की है जो NEET की तैयारी कर रही हैं और वे स्वयं मालेगांव में स्थित भारत सरकार कपड़ा मंत्रालय के कपड़ा आयुक्त कार्यालय में वीविंग टेक्नोलॉजिस्ट हैं। वे बताते हैं कि मेरे बेटे अम्मार ने हाफिज ए कुरआन का कोर्स बड़ी ही मेहनत और मशक्कत के साथ पूरा किया और ये मुकाम हासिल किया है, जिसकी उसे उपाधि दी गई है।
कुरआन के पैगाम को दुनिया तक पहुंचाएं
इसका मकसद ये है कि हम कुरआन के पैगाम को दुनिया तक पहुंचाएं और हमारे वतनी भाइयों तक पहुंचाएं। कुरआन हमे ये पैगाम देता है कि हम सभी प्यार और मोहब्बत के साथ रहें। एक दूसरे का ख्याल रखें। मेरे बेटे अम्मार ने नाइंथ क्लास में पढ़ते हुए हाफिज ए कुरआन का कोर्स मुकम्मल किया है, क्योंकि हमारा मकसद था कि हम दीन और दुनिया दोनों की शिक्षा साथ में लेकर चलें, जबकि अल्लाह (ईश्वर) कहता है कि तुम दीन और दुनिया दोनों की तालीम हासिल करो और एक अच्छे, IAS,IPS, जज, वकील और डॉक्टर बनकर लोगो की खिदमत (सेवा) करो।
इमाम ने भी दी मुबारकबाद
हमारी कोशिश रहेगी की, कुरआन के इंसानियत के पैगाम को हम लोगों तक पहुंचाएं और उस परहम स्वत: भी अमल करते हुए उसे आम करे और एक अच्छा इंसान बनकर अपनी जिंदगी बशर करें।अम्मार की इस उपलब्धि पर उन्हे मालेगांव स्थित मदरसे से कुरआन हिफ्ज की उपाधि दी गई है। अम्मार की इस सफलता से उनका पूरा परिवार खुश है। पढ़ाना की शाही जामा मस्जिद के पेश इमाम ने भी मुबारकबाद देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।