उन्होंने पूर्व संगठन महामंत्री रामलाल पर परोक्ष रूप से हमला करते हुए लिखा, 'अवसर को बांटो पर चाटो नहीं। कुछ लोग इंसान होते हुए भी अपने को भगवान मानने लगते हैं। अपने मन में कभी यह भाव नहीं आना चाहिए कि मैं ही समझदार हूं।आप भी समझदार हैं, पर आपके अलावा भी लोग समझदार हैं। आपको अवसर मिल गया और उन्हें अवसर नहीं मिला। अगर आपको अवसर मिला है तो सभी की योग्यता का लाभ लेना चाहिए।'
"कम बोलना" अच्छा है। कम बोलने से यह भी बात आती है कि इन्हें बोलना ही नहीं है और बोलना आता ही नहीं है। ज्यादा नहीं बोले पर यह तो सोचे कि नहीं बोलने के चक्कर में सच का गला तो नहीं घोटें। आप जो आज हैं, कल नहीं थे। साथ ही कल भी नहीं रहेंगे, अतः आपका व्यवहार ही आपका जीवन भर साथ देगा।
"नाटक" का पटाक्षेप अवश्य होता है। जीवन नाटक नहीं यथार्थ है। सभी को जीना है। जो नाटक करता है वह यह नहीं समझता है कि समय आने पर नाटक की पोल खुल जाएगी। तब क्या होगा? "आप" और "हम", "मैं" और "तू" में अंतर है। एक में विनम्रता है तो दूसरे में अपनत्व है। वहीं यह राग बिगड़ता है तो मानवीय संबंध बिगड़ जाते हैं।
सामान्य तौर पर आप जब किसी निर्णायक पद पर आएं तो राजा हरिश्चंद्र के चरित्र को अवश्य अपने सामने रखें। "अपने काम पर विश्वास रखें"। वे लोग सदैव असफल होते हैं, जो खुद भी काम नहीं करते और किसी को करने नहीं देते।
अच्छा व्यक्ति "संगठक" वह है जो हर व्यक्ति को काम मे जुटा ले। दूसरों को हार्दिक कष्ट देने वालों को जब खुद हार्दिक कष्ट होता है, तभी उसे अपनी गलती समझ में आती है। किसी के सम्मान के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। कल आपके साथ भी हो सकता है।
कल क्या होगा, वह कोई नहीं जानता। पर आज हम क्या करें इसकी समझ तो हमें रखनी होगी। हमारे आज में ही कल छुपा हुआ है। आप जो नहीं हैं, उसे बनने के लिए प्रयास तो करें पर नाटक नहीं। "दायित्व" का मतलब "मैं ही हूं" का भाव नहीं होना चाहिए। "जाही विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए" के भाव को समझकर अपना कार्य करना चाहिए।