जब राजधानी दिल्ली और मुंबई में कुछ घंटे पानी की सप्लाई थमती है, तो शहर की सांसें ही नहीं थमतीं, अफ़सरों के गले भी सूखते हैं। मगर रंगारेड्डी के गांव रेगाड़ी मायलारम और कटनी के गांव रैपुरा में ऐसा नहीं होता। दो साल बाद भी ऐसा नहीं हुआ है।
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तेलंगाना के गांव रेगाड़ी मायलारम के चिन्ना मोवुलैय्या आसिनप्पा ने पानी के लिए अपना भाई खोया और अब पानी के लिए अपना गांव भी छोड़ दिया है, वैसे वह तीन एकड़ खेतिहर ज़मीन के मालिक हैं।
चिन्ना आसिनप्पा के साथ मैं उसी बोरवेल पर खड़ा था जहां कुछ साल पहले उनके 20 वर्षीय भाई की मौत हुई थी। तेलुगु में उनकी बातों का मतलब मुझे बताया एक स्थानीय व्यक्ति ने। ''वह रोज़ खेत पर आता था और बोरवेल में पानी का पता लगाता था। उस दिन कोई दिक़्क़त थी, जिसे वह देखने आया और करंट लग गया।''
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आसिनप्पा के मुताबिक़, ''दो साल पहले तक बोरवेल में पानी ठीक था, बाद में जलस्तर 200 फ़ीट नीचे चला गया। अभी बोरवेल में बिल्कुल पानी नहीं है। तीन बोर डाले थे जो कुछ समय तक ठीक चले, फिर बाद में पानी ख़त्म हो गया। फिर एक और डाला और वह फ़ेल हो गया, पानी 250 फ़ीट नीचे चला गया। 20 पाइप लगाए थे, वो भी फ़ेल हो गए।''
लोग गांवों को छोड़कर शहरों की ओर चले
दो बच्चों के पिता आसिनप्पा अब गांव में कभी-कभार आते हैं वह भी यह देखने कि बोरवेल में पानी है या नहीं। वह हैदराबाद के पास चेवेल्ला में एक खेत पर मज़दूरी करते हैं।
अपनी तीन एकड़ ज़मीन के टुकड़े पर खेती के बाद वह 40 थैले चावल उगाते थे जिनसे उन्हें छह महीने में 40-50 हज़ार रुपए तक मिल जाते थे, अब रोज़ मज़दूरी के बाद उन्हें और उनकी पत्नी को 200 रुपए तक मिलते हैं।
क़रीब चार हज़ार की आबादी वाले गांव रेगाड़ी मायलारम में पानी न होने से अब गांव के मवेशी भी मरने लगे हैं क्योंकि उनके लिए किसान चारा भी नहीं जुटा पा रहे।
रेगाड़ी मायलारम के कुछ दिन बाद मैं स्वराज अभियान की ओर से निकाली गई संवेदना यात्रा के साथ मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले के गांव रैपुरा पहुंचा। वहां के हालात भी अच्छे नहीं थे। सबसे पहले मेरी मुलाक़ात वहां लखनलाल यादव से हुई।
छूटते ही बोले, ''सबसे बड़ी समस्या पानी है, बोरवेल 250-300 फ़ीट तक खोदते हैं। जो सरकारी बोरवेल हुए हैं उनमें केसिंग सस्ती डाल दी है। यहां जीआई लोहे की पड़नी चाहिए तब कामयाब होगा।''
मध्यप्रदेश के गांवों में बस दो माह का पानी शेष
जब मैं लखनलाल से बात कर रहा था तभी सबने एक स्वर में मुझे बताया कि गांव की प्रमुख खेती धान है जो इस साल बारिश न होने से 90-95 फ़ीसदी तक बर्बाद हो चुकी है।
उनका कहना था, ''यहां फ़िलहाल कोई काम नहीं है, गारंटी (मनरेगा) भी नहीं खुल रही यहां की। सब बैठे हैं कुछ काम-धाम नहीं करते, जो पढ़े-लिखे हैं, वो शहर चले गए हैं। कहीं प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं, कुछ मिस्त्री का काम कर रहे हैं। 250-300 आदमी चले गए हैं बाहर, पास में कटनी है। जो मज़दूर हैं उनका भी काम रुका है गिट्टी रेता की वजह से।''
मैंने गांव का सबसे बड़ा तालाब देखा तो उसकी तली में मौजूद पानी कीचड़ में बदल चुका था, गांव वालों ने बताया कि सिर्फ़ नवंबर तक ही पीने का पानी है।
''ढोरों की मुसीबत हो जाएगी, दो महीना काम चल जाएगा, चारा भी ख़त्म पानी भी ख़त्म। बड़ी मुसीबत गुज़रेगी अब, जानवर ढाई–तीन हज़ार हैं यहां। अभी वर्तमान में जो धान बोई थी सूख रही है, उसी को चरा रहे हैं।''
गांववासी गणेश प्रसाद कुशवाहा ने मुझे इस समस्या का हल बताया, ''यहां पानी की बहुत समस्या है। यहां एक बांध है जो बंध जाए तो समस्या हल हो सकती है। जो अपने बोर हैं वो चलने लगेंगे, यह मांग उठाई है और पास भी हो गया है। चर्चा चल रही हैं, जितनी जल्दी हो सके इसकी व्यवस्था की जाए। पानी लाने की व्यवस्था हो सकती है लखावतीरी में नहर से।''
क़रीब पांच हज़ार की आबादी वाले रैपुरा में 21 हैंडपंप हैं। पर मुश्किल से पांच-छह चलते हैं, मैंने ख़ुद एक हैंडपंप चलाया तो 20 मिनट तक चलाने के बाद उसमें से पानी निकलना शुरू हुआ। हैंडपंप 180 से 200 फ़ीट की गहराई पर खोदे गए हैं।
रेगाड़ी मायलारम और रैपुरा तो सिर्फ़ वो दो नाम हैं, जहां मैं पहुंच सका। सूखे कुओं, बावड़ियों और तालाबों वाले गांवों के नामों की सूची काफ़ी लंबी हो गई है। कहा नहीं जा सकता कि यह सूची कब तक छोटी होगी, होगी भी या नहीं।