मध्य प्रदेश चुनावों में कांग्रेस के घोषणा पत्र-2013 का एक प्रस्ताव आम जनता के लिए नहीं है, बल्कि गुस्से से भरे हुए उन बागी नेताओं के लिए है, जिन्हें टिकट नहीं मिला।
कांग्रेस नेतृत्व अब इन नेताओं को विधानपरिषद का सदस्य (एमएलसी) बनाने का चारा फेंक रहा है ताकि वे बगावती तेवर छोड़कर कांग्रेस को चुनाव जिताने में मदद करें।
संभावना तो यह भी है कि भाजपा अपने घोषणा पत्र में भी विधानपरिषद के गठन का प्रस्ताव रखे ताकि उन्हें बागियों को समझाने में मदद मिल सके।
मुसलमानों को प्रतिनिधित्व
मध्य प्रदेश में मुसलमान विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पा रहे हैं। एक आऱिफ अकील ही ऐसे सदस्य हैं जो भोपाल उत्तर से लगातार विधानसभा में चुने जा रहे हैं।
भाजपा ने भी 20 बाद आरिफ बेग को टिकट दिया है।
मुसलमानों को मंत्री पदों पर लाने और विधानपरिषद में लाने के लिए भी कांग्रेस में इस प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है।
कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र 2013 में मध्य प्रदेश में विधान परिषद के गठन का प्रस्ताव रखा है। मध्य प्रदेश में विधानपरिषद गठित करने का प्रस्ताव दिग्विजय सिंह ने 2003 के घोषणा पत्र में दिया था।
वर्ष 2008 में प्रदेशाध्यक्ष सुरेश पचौरी ने भी घोषणा पत्र में यह प्रस्ताव रखा था। दोनों ही बार कांग्रेस चुनाव हार गई थी। वर्ष 2013 के घोषणा पत्र में जब यह प्रस्ताव रखा गया है, तब इसकी उपयोगिता नजर आ रही है।
कटा है जिनका टिकट
मध्य प्रदेश विधानसभा में अभी 230 सीटें हैं। उस हिसाब से मध्य प्रदेश में यदि विधानपरिषद का गठन किया जाता है तो विधानपरिषद में करीब 75 सदस्यों को चुना जा सकेगा।
कांग्रेस यदि एमएलसी का ऑफर देकर अभी यदि 50-60 सीटों पर भी बागियों को मनाने में कामयाब हो जाती है और प्रभावशाली नेताओं को कांग्रेस को चुनाव जिताने के काम में लगाया जा सकता है।
कांग्रेस के ऐसे कई प्रभावशाली नेता हैं, जिन्हें टिकट नहीं मिले हैं, लेकिन वे खामोशी से कांग्रेस प्रत्य़ाशी को चुनाव हराने में सक्षम हैं।
टिकटों का बंटवारा करते समय कांग्रेस को सोशल इंजीनियरिंग के चलते भी कई नेताओं के टिकट काटने पड़े हैं।
उसके अलावा कांग्रेस उस गैर राजनीतिक तबके को भी विधानपरिषद में प्रतिनिधित्व देना चाहेगी, जो उन्हें बाहर से समर्थन कर रहा है।