लगता है कि अफसरी का रुतबा अब ठगी का नया हथियार बन गया है। कोई फर्जी आईएएस बनकर नौकरी का झांसा दे रहा था तो कोई ज्वाइंट सेक्रेटरी बनकर वीआईपी सुविधा मांग रहा था। पिछले कुछ महीनों में एमपी पुलिस ने ऐसे पांच फर्जी अफसर पकड़े हैं।
कभी सरकारी अफसर का रौब, कभी लालबत्ती वाली गाड़ी और कभी सोशल मीडिया पर हजारों फॉलोअर्स। सामने वाला प्रभावित हुआ नहीं कि भरोसे का कत्ल कर ठगी का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह कहानी किसी बेरोजगार युवक की नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में आईएएस-आईपीएस बनकर लाखों की ठगी करने वाले जालसाजों की है।
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एमपी में पिछले कुछ महीनों में पांच फर्जी आईएएस-आईपीएस पकड़े जा चुके हैं, जो अधिकारियों और जनता पर धौंस जमाकर शासकीय सुविधाओं का फायदा उठा रहे थे और लोगों को अलग-अलग कामों व सरकारी नौकरी का झांसा देकर लाखों का खेल कर रहे थे। मध्य प्रदेश में ठगी के इस नए तरीके ने पुलिस और प्रशासन के सामने चुनौती खड़ी कर दी है।
जालसाज अब सिर्फ बैंक अधिकारी, पुलिसकर्मी या रिश्तेदार बनकर ही लोगों को नहीं फंसा रहे, बल्कि सीधे आईएएस और आईपीएस अधिकारी बनकर मैदान में उतर रहे हैं। जालसाज इतने शातिर हैं कि वे फर्जी आईडी कार्ड, सरकारी विभागों के नाम वाले दस्तावेज, लग्जरी कार, महंगे होटल और सोशल मीडिया की चमक दिखाकर लोगों को झांसे में लेकर ठग रहे थे। इनका निशाना केवल बेरोजगार युवा नहीं रहे। महिला डॉक्टर से लेकर होटल प्रबंधन, ड्राइवर, सर्किट हाउस और मंदिर प्रबंधन तक इनके कथित फर्जी रुतबे की चपेट में आ चुके हैं। प्रदेश में सामने आए ऐसे पांच मामलों की पड़ताल करने पर ठगी के इस नए ट्रेंड की तस्वीर साफ दिखाई देती है।
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किसी की पोल फर्जी दस्तावेजों की स्पेलिंग मिस्टेक ने खोली तो किसी का रौब 16 हजार रुपये के होटल बिल पर जाकर खत्म हुआ। एक आरोपी ने तो किराए के मकान को ही कलेक्टर कार्यालय जैसा बना डाला, जबकि दूसरे ने महाकाल की भस्म आरती में वीआईपी सुविधा लेने के लिए खुद को केंद्र सरकार का संयुक्त सचिव बता दिया।
तृप्ति सिंह राजपूत
- फोटो : अमर उजाला
फर्जी आईएएस ने एमपी टूरिज्म की एडिशनल डायरेक्टर बनकर ठगा
मध्य प्रदेश में फर्जी आईएएस बनकर ठगी का सबसे चर्चित मामला तृप्ति सिंह राजपूत से जुड़ा है। पुलिस के मुताबिक तृप्ति खुद को आईएएस अधिकारी और मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम की एडिशनल डायरेक्टर बताकर लोगों पर प्रभाव जमाती थी। उसके भाई सुधांशु सिंह और अन्य लोगों के नाम भी मामले में सामने आए हैं। तृप्ति भारत सरकार की नेमप्लेट लगी लग्जरी इनोवा से घूमती थी। उस पर सरकारी नौकरी दिलाने और दूसरे फायदे का भरोसा देकर लाखों रुपये लेने के आरोप हैं। उसके खिलाफ सिवनी, बालाघाट और अशोकनगर से जुड़े मामलों में भी शिकायतें सामने आईं।
पुलिस की तलाशी में महंगे मोबाइल फोन, होटल के बिल, फ्लाइट टिकट और फर्जी दस्तावेज मिलने की जानकारी सामने आई। यानी जिस जिंदगी को देखकर लोग उसे बड़ा सरकारी अधिकारी समझें, वही उसके फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा हथियार थी।
विकास यादव
- फोटो : अमर उजाला
आठवीं पास आईएएस, महिला डॉक्टर से दोस्ती की और पकड़ाया
ग्वालियर का रहने वाला विकास गौतम कभी दिल्ली के मुखर्जी नगर में कोचिंग सेंटर के बाहर चाय बेचता था। सिविल सेवा की तैयारी करने वाले युवाओं को देखकर उसे अफसरों की दुनिया का अंदाजा हुआ। इसके बाद उसने उसी दुनिया को अपनी पहचान बना लिया। 2020 में जब आईएएस का परिणाम आया तो उसने चयनित अभ्यर्थियों की सूची और सोशल मीडिया का सहारा लेकर अपनी पहचान 'विकास यादव आईएएस' के रूप में बना ली। देखते-देखते सोशल मीडिया पर उसके फॉलोअर्स बढ़ते गए और उसका रुतबा असली जिंदगी में इस्तेमाल होने लगा।
उसने खुद को ट्रेनी आईएएस बताकर एक महिला डॉक्टर से दोस्ती की। इसके बाद मां के इलाज का हवाला देकर उससे 25 हजार रुपये लिए। मामला साइबर सेल तक पहुंचा और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई में उसकी असली पहचान सामने आ गई। उसके खिलाफ सोशल मीडिया के जरिए 14 लाख रुपये से अधिक की ठगी के आरोप भी सामने आए हैं।
स्पेलिंग से पकड़ा गया फर्जी आईपीएस ऋषि यादव
एमटेक कर चुका ऋषि कुमार यादव नौकरी की तलाश में था लेकिन उसने नौकरी करने की बजाय खुद को ही सरकारी अधिकारी बना लिया। भोपाल के एमपी नगर में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों से संपर्क कर उसने खुद को 2016 बैच का आईपीएस अधिकारी और इनकम टैक्स विभाग का असिस्टेंट इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बताया।
ऋषि कुमार एमपी नगर के अन्नपूर्णा कैफे में छात्रों से मुलाकात कर उन्हें सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा देता था। कथित तौर पर उसने उनसे एक-एक लाख रुपये की मांग की। अपनी पत्नी को भी दिल्ली आबकारी विभाग की अधिकारी बताए जाने की बात सामने आई है। उसने पुराने आईडी कार्ड को एडिट कर फर्जी पहचान पत्र और जॉइनिंग लेटर तैयार किया लेकिन फर्जी अफसर असली अफसर वाली एक गलती नहीं कर पाया, दस्तावेज तैयार करने में कई स्पेलिंग मिस्टेक छोड़ दीं। छात्रों को शक हुआ। उन्होंने दस्तावेजों को खंगाला और मामला पुलिस तक पहुंच गया। जांच के बाद एमपी नगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। एक छोटी-सी स्पेलिंग की गलती ने बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश कर दिया।
किराए के घर में बनाया 'कलेक्टर ऑफिस'
इंदौर में हिमांशु पांचाल ने फर्जी आईएएस का ऐसा सेटअप तैयार किया कि देखने वाला कुछ देर के लिए भ्रमित हो जाए। अहमदाबाद निवासी हिमांशु करीब एक महीने पहले अपनी मां के साथ इंदौर आया और ओमेक्स सिटी में किराए का मकान लिया। मकान के बाहर बाकायदा 'आईएएस राज सोनी, जिला कलेक्टर' की नेमप्लेट लगा दी। इसके बाद 2,500 रुपये प्रतिदिन के किराए पर कार और ड्राइवर रखे गए। ड्राइवरों को कथित तौर पर जल्द पोस्टिंग होने और सरकारी नौकरी दिलाने का भरोसा दिया करता था।
पुलिस के पहुंचने पर कमरे की सजावट देखकर वह भी हैरान रह गई। सीलिंग पर रुई लगाकर बादलों जैसा लुक बनाया गया था। आरजीबी लाइट्स और जगह-जगह आईएएस लिखी तस्वीरें लगी थीं। मानो किराए के मकान में कलेक्टर का कैंप ऑफिस बना हो। इसके बाद बायपास के एक सितारा होटल में ड्राइवरों के परिवार के लिए पार्टी रखी गई। बिल करीब 16 हजार रुपये आया। उसने रजिस्टर में 'आईएएस राज सोनी' लिखकर रिव्यू दिया और कहा कि बिल उसका पीए चुका देगा। होटल प्रबंधन को शक हुआ। सूचना पुलिस तक पहुंची और लसूडिया पुलिस ने दबिश देकर कथित फर्जी कलेक्टर का पर्दाफाश कर दिया।
भस्म आरती के वीआईपी पास की जिद में पकड़ाया फर्जी ज्वाइंट सेक्रेटरी
महाकाल की भस्म आरती में वीआईपी दर्शन का आकर्षण किसी से छिपा नहीं है। इसी व्यवस्था का लाभ उठाने की कोशिश में दिल्ली से उज्जैन पहुंचे अतुल कुमार ने खुद को भारत सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय का संयुक्त सचिव बताया। उसने सर्किट हाउस में दो कमरे बुक कराने का प्रयास किया और मंदिर में तड़के होने वाली भस्म आरती के लिए वीआईपी सुविधा देने का दबाव बनाया। अधिकारियों ने जब पद और पहचान के दस्तावेज मांगे तो वह पहले बात टालता रहा। बाद में परिवार में कई आईएएस होने और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार का पत्र होने का दावा किया।
महाकाल थाना पुलिस और मंदिर प्रबंधन ने सीधे संबंधित मंत्रालय से जानकारी ली। पता चला कि इस नाम का कोई संयुक्त सचिव वहां पदस्थ ही नहीं है। इसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
ठगी का तरीका अलग, लेकिन मानसिकता एक
इन पांचों मामलों में आरोपियों के चेहरे अलग-अलग हैं, शहर अलग हैं और ठगी का तरीका भी अलग-अलग है लेकिन इनके पीछे एक ही फॉर्मूला नजर आता है- पद का नाम लो, रुतबा दिखाओ, सामने वाले का भरोसा जीतो और फिर उसी भरोसे को ठगी का जरिया बना दो।
सरकारी अधिकारी की पहचान अपने आप में प्रभाव पैदा करती है। यही वजह है कि जालसाज नकली आईडी से आगे बढ़कर अब पूरी 'अफसरी की कहानी' तैयार कर रहे हैं। लग्जरी कार, सरकारी नेमप्लेट, सोशल मीडिया प्रोफाइल, महंगे होटल, फर्जी नियुक्ति पत्र और वीआईपी प्रोटोकॉल- हर चीज उनके कथित फर्जी किरदार को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल होती है। परंतु हर फर्जी अफसर के पीछे कोई न कोई कमजोर कड़ी छिपी थी। किसी ने दस्तावेज में गलती की, किसी ने होटल का बिल चुकाने के बजाय पीए का नाम लिया और किसी ने ऐसा सरकारी पद बता दिया, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं था।
यही वजह है कि सरकारी नौकरी, ठेके, पोस्टिंग, वीआईपी सुविधा या किसी भी सरकारी काम के नाम पर पैसा मांगने वाले व्यक्ति की सिर्फ वर्दी, गाड़ी, आईडी या सोशल मीडिया प्रोफाइल देखकर उस पर भरोसा करना भारी पड़ सकता है।