हाईकोर्ट जस्टिस आनंद पाठक तथा जस्टिस बीपी शर्मा की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि सिर्फ लंबे समय तक कार्य करने के आधार पर नियमितिकरण का दावा नहीं किया जा सकता है। संबंधित कर्मचारियों को सरकारी नीति का लाभ लेने के लिए निर्धारित कट-ऑफ तिथि से निरंतर सेवा का विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक था। युगलपीठ ने सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ के आदेश को निरस्त कर दिया।
सरकार की तरफ से दायर अपील में कहा गया था कि सीधी के संजय गांधी स्मृति शासकीय महाविद्यालय के कर्मचारियों को एकलपीठ ने स्थाई कर्मचारी नियुक्त करने के संबंध में आदेश जारी किए हैं। इन कर्मचारियों की नियुक्ति कॉलेज की जनभागीदारी समिति द्वारा की गई थी। जनभागीदारी समिति को राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना नियमित पद सृजित करने अथवा सरकारी नियुक्ति करने का अधिकार नहीं है। समिति द्वारा किसी व्यक्ति की सेवाएं लेने मात्र से उसे नियमित सरकारी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल जाता।
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युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि कर्मचारियों ने दावा किया था कि वे 15 वर्ष से अधिक समय से महाविद्यालय में कार्यरत हैं और सामान्य प्रशासन विभाग की सात अक्टूबर 2016 की नीति के तहत स्थाई कर्मचारी का दर्जा पाने के हकदार हैं। कर्मचारी 16 मई 2007 से निरंतर सेवा का ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। रिकार्ड में केवल अक्टूबर 2010 के बाद के लेबर चार्ज बिल उपलब्ध हैं। कर्मचारियों को निरंतर सेवा का विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक था। युगलपीठ ने सरकार की अपील स्वीकार करते हुए महाविद्यालय के 11 कर्मचारियों को स्थाई कर्मी का दर्जा देने संबंधी एकलपीठ का आदेश निरस्त कर दिया।