मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी आरोपी को मुख्य आपराधिक मामले में दोषमुक्त कर दिया जाता है, तो उसे केवल एससी-एसटी एक्ट के तहत दंडित नहीं किया जा सकता। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस ए.के. सिंह की युगलपीठ ने अपीलकर्ता कैलाश उर्फ बबलू यादव की अपील स्वीकार करते हुए जिला न्यायालय द्वारा सुनाई गई दोहरे आजीवन कारावास सहित अन्य धाराओं की सजा को निरस्त कर दिया। साथ ही आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
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सीधी जिले से जुड़ा था मामला
अपीलकर्ता के खिलाफ सात मार्च 2021 को सीधी जिले के चुरहट थाने में मामला दर्ज हुआ था। आरोप था कि उसने विशेष वर्ग की नाबालिग पीड़िता का अपहरण कर उससे दुराचार किया। इसी आधार पर पॉक्सो और एससी-एसटी एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया गया। जिला न्यायालय ने सुनवाई के बाद उसे दोहरे आजीवन कारावास और अन्य धाराओं में सजा सुनाई थी।
उम्र को लेकर उठे संदेह
अपील के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पीड़िता की बहन ने अपने बयान में कहा कि उसकी और पीड़िता की उम्र में तीन साल का अंतर है और उसके तीन बच्चे हैं, जिनमें सबसे बड़ा 11 साल का है। इससे अनुमान लगाया गया कि पीड़िता की बड़ी बहन की उम्र 30 साल से अधिक होगी। साथ ही स्कूल रजिस्टर में दर्ज पीड़िता की जन्मतिथि में कटिंग पाई गई, जिस पर किसी प्राधिकारी के हस्ताक्षर नहीं थे। समग्र आईडी में बड़ी बहन की उम्र 22 साल दर्ज थी और पीड़िता ने स्वयं कहा कि उसे अपनी जन्मतिथि का ज्ञान नहीं है।
स्वेच्छा से गई थी पीड़िता
पीड़िता ने अपने बयान में स्वीकार किया कि वह आरोपी के साथ अपनी इच्छा से गई थी। अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय वह नाबालिग थी। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि अपहरण का अपराध सिद्ध नहीं होता और जब मुख्य अपराध में सबूत नहीं हैं तो एससी-एसटी एक्ट के तहत सजा नहीं दी जा सकती।
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देश के अन्य हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला
युगलपीठ ने अपने आदेश में देश के अन्य हाईकोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि जन्मतिथि के संबंध में कोई प्रमाणित दस्तावेज नहीं है, तो माता-पिता से जांच की जानी चाहिए। यहां ऐसा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप, अपीलकर्ता को पॉक्सो, अपहरण और एससी-एसटी एक्ट, सभी धाराओं से दोषमुक्त किया गया और जेल से तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया।