सार
कांस्टेबल (ड्राइवर) पद पर नियुक्ति के लिए 12 साल की कानूनी लड़ाई के बाद, हाईकोर्ट ने रत्नेश कुमार सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने आपराधिक मामले में समझौते से दोषमुक्ति को अयोग्यता न मानते हुए नियुक्ति के आदेश दिए। हालांकि, वरिष्ठता और पूर्व वेतन का अधिकार नहीं होगा।
कांस्टेबल (ड्राइवर) पद में नियुक्ति के लिए याचिकाकर्ता को 12 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ना पड़ी। इस दौरान उसने हाईकोर्ट में चार याचिका प्रस्तुत की। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता के पक्ष में राहतकारी आदेश पारित किया है। एकलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि आपराधिक मामले में समझौते के आधार पर दोषमुक्त किए जाने को अयोग्ता का आधार नहीं माना जा सकता है।
एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को पुलिस कांस्टेबल पद पर नियुक्ति प्रदान करने के आदेश जारी किए हैं। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता को वरिष्ठता प्रदान नहीं जाए परंतु वह पूर्व के वेतन का हकदार नहीं होगा।
बता दें कि कोतमा अनूपपुर निवासी रत्नेश कुमार सिंह की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि उसने मप्र प्रोफेशनल बोर्ड द्वारा 2012 में आयोजित पुलिस कांस्टेबल ड्राइवर पद के लिए आवेदन किया था। उसके खिलाफ थाना भालूमाडा जिला अनूपपुर में धारा 325 के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया था। समझौते के आधार पर न्यायालय ने उसके दोषमुक्त कर दिया था। इसका उल्लेख उसने अपने आवेदन में दिया था। लिखित व ट्रेड टेस्ट में उत्तीर्ण होने के बावजूद भी उसे नौकरी प्रदान नहीं की।
याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया था कि इसके पूर्व उसने तीन याचिकाएं दायर की थीं। पहली याचिका का निराकरण करते हुए हाईकोर्ट ने उसके अभ्यावेदन का पर विचार करने के आदेश जारी किए थे। अभ्यावेदन खारिज किए जाने के बाद उसने पुनः याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार याचिका के अभ्यावेदन पर विचार करने के निर्देश दिए थे। दूसरी बार भी अभ्यावेदन खारिज होने के बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की थी। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर पुनर्विचार करने आदेश जारी किए थे। तीसरी बार भी अभ्यावेदन खारिज होने के कारण उक्त याचिका दायर की गई है।
याचिका की सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि प्रतिवादियों ने इस सोच के साथ निपटाया है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ मामला साबित हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिवादियों की यह धारणा है कि समझौता करने का अर्थ स्वतः ही प्रश्नगत पद के लिए अयोग्यता है। वर्तमान मामले में पड़ोसियों के साथ बीच विवाद था। याचिकाकर्ता मुख्य हमलावर नहीं था। राज्य अधिकारियों द्वारा विचार-विमर्श के तीनों दौर में एक भी शब्द नहीं कहा कि मामले के शिकायतकर्ता को क्या चोट लगी है, जिससे याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 325 के तहत मुकदमा चलाने का औचित्य सिद्ध हो सके। ऐसे तथ्यात्मक परिदृश्य को देखते हुए, याचिकाकर्ता के खिलाफ मामला तुच्छ और झूठा प्रतीत होता है। आईपीसी की धारा 325 के तहत अपराध को नैतिक पतन से जुड़े अपराध के रूप में नहीं रखा गया है। जिससे याचिकाकर्ता के चरित्र का नकारात्मक तरीके से आकलन किया जा सके। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि लिखित परीक्षा और ट्रेड टेस्ट के परिणाम को प्रभावी करते हुए निम्न योग्यता होने पर नियुक्ति दी गई है तो याचिकाकर्ता को कांस्टेबल (ड्राइवर) के पद पर भी नियुक्ति दी जाए। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने पैरवी की।