मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ
- फोटो : अमर उजाला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण से जुड़े मामले में अहम आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई नानी अपनी नाबालिग नातिन का पालन-पोषण कर रही है, तो केवल कानूनी अभिभावक नियुक्त नहीं होने के आधार पर बच्ची के भरण-पोषण की मांग को खारिज नहीं किया जा सकता। जबलपुर स्थित हाईकोर्ट की एकलपीठ ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए दोबारा सुनवाई करने के निर्देश दिए हैं।
असहाय बच्चों को न्याय दिलाने के लिए प्रावधानों की व्याख्या जरूरी
हाईकोर्ट के जस्टिस डी. डी. बंसल की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि भरण-पोषण संबंधी कानूनी प्रावधानों की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए, जिससे असहाय बच्चों को न्याय मिल सके। बच्ची के अधिकारों को केवल इस आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता कि उसकी ओर से आवेदन प्रस्तुत करने वाली नानी विधिवत नियुक्त कानूनी अभिभावक नहीं है। इसी आधार पर एकलपीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।
मां की मृत्यु के बाद नानी कर रही बच्ची का पालन-पोषण
मामले के अनुसार, जबलपुर के गोपाल बाग निवासी सविता चौरसिया ने अपनी नाबालिग नातिन सिद्धि चौरसिया की ओर से आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया कि उनकी बेटी सपना चौरसिया का विवाह शैलेन्द्र चौरसिया से हुआ था। सपना ने 26 सितंबर 2015 को बेटी सिद्धि को जन्म दिया था। बीमारी के कारण 19 मई 2018 को सपना की मृत्यु हो गई। इसके बाद सिद्धि अपनी नानी के पास रहने लगी और वही उसका पालन-पोषण कर रही हैं।
जनवरी 2019 में मांगा था भरण-पोषण
याचिका के अनुसार, बच्ची का उचित भरण-पोषण करना कठिन होने के कारण सविता चौरसिया ने जनवरी 2019 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें अंतरिम भरण-पोषण की मांग भी की गई थी, ताकि बच्ची की देखभाल और जरूरतों को पूरा किया जा सके।
फैमिली कोर्ट ने कानूनी अभिभावक नहीं होने पर खारिज किया था आवेदन
फैमिली कोर्ट ने 5 सितंबर 2022 को भरण-पोषण के आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि सविता चौरसिया को बच्ची का विधिवत कानूनी अभिभावक नियुक्त नहीं किया गया है। इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की गई। याचिका में फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करने की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने दोबारा सुनवाई के दिए निर्देश
एकलपीठ ने मामले के तथ्यों और विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों का उल्लेख करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही प्रकरण की पुनः सुनवाई करने के निर्देश दिए। इस आदेश में अदालत ने बच्ची के भरण-पोषण के अधिकार और असहाय बच्चों को न्याय उपलब्ध कराने के महत्व पर जोर दिया है।