चार-पांच माह बाद होने वाले लोकसभा चुनाव-2024 को लेकर सत्तापक्ष भाजपा नीत राजग और कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। ऐसे में चुनाव से जुड़े पिछले कुछ दिलचस्प मामलों की जानकारी अमर उजाला आप तक पहुंचा रहा है। आज बात करते हैं 1951-52 में एक साथ हुए देश की लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के पहले चुनाव की।
दोनों चुनाव एक साथ करवाना मुश्किल कार्य था, जिसका श्रेय देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकमार सेन को जाता है। देश में सैकड़ों वर्षों तक राजशाही रही और अंग्रेजी राज के दौर में तो लोकतंत्र का सवाल ही नहीं था। देश के कर्णधार आजादी और लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे थे। आखिर उन्हें सफलता मिली और ब्रिटिश अधिपत्य का दौर खत्म हुआ और ट्रांसफर ऑफ पावर हुआ। फिर देश की बागडोर देसी कर्णधारों को सौंपी गई।
लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हासिल करना और देश में आम चुनाव करवाना एक कठिन काम था। मतदाता सूची बनवाना, नाम जोड़ना, चुनाव कैसे हों इसकी संपूर्ण तैयारी करना जैसे भगीरथी कार्य करवाने का श्रेय पहले चुनाव आयुक्त के प्रशानिक अनुभव का परिणाम था।
मात्र 18 फीसदी थी साक्षरता
1951 में देश में साक्षरता का प्रतिशत 18. 32 प्रतिशत था। इसमें महिला साक्षरता 8.86 प्रतिशत थी। ग्रामीण महिला साक्षरता देखें तो वह और भी कम होकर 4.87 फीसदी थी। 75 वर्ष पूर्व महिलाओं को पारिवारिक स्वतंत्रता का नितांत अभाव था।
मतदाता सूची में रिश्ते लिखे जाते थे
मतदाता सूची में महिलाओं ने अपने नाम अमुक की पत्नी, उसके पिता की बहू, फलाने की मां, सुबह उगने वाले के नाम, रात्रि में चमकने वाले टिम-टिम, ऐसे नाम दर्ज थे। चुनाव आयुक्त इस तरह नामों से नाराज हो गए और उन्होंने करीब 16 लाख नाम मतदाता सूची से हटवाए। जाहिर है तब देश में शिक्षा और साक्षरता का बहुत अभाव था।
पहले चुनाव में कैसे कैसे अनुभव और तैयारियों का कार्य करना पड़ा इन सब बातों का देश के पहले चुनाव की चुनाव आयोग की रिपोर्ट जो दो भागो में प्रकशित हुई थी उसमे उल्लेख है। प्रथम रिपोर्ट 249 और दूसरी रिपोर्ट 889 पृष्ठों की है, जो चार फरवरी 1955 को प्रकाशित हुई थी। चुनाव होने के पांच वर्ष बाद रिपोर्ट प्रकाशन होना इस बात को दर्शाता है कि जानकारी संग्रह करना और अन्य साधनों का अभाव था।
प्रथम चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग द्वारा परिणामों की विस्तृत जानकारी की रिपोर्ट प्रकाशन में अपने प्राकथन में उल्लेख किया है कि -"1951-52 के चुनावों की रिपोर्ट के प्रकाशन में विलंब हुआ। चुनाव आयोग द्वारा कच्ची जानकारी राज्यों को समय पर भेज दी गई थी, परंतु आंकड़ों को संग्रह करने में राज्यों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। चुनाव आयोग भी राज्यों के परिसीमन कार्य में संलग्न हो गया था।
सूडान गए थे मुख्य चुनाव आयुक्त सेन
इस बीच, मुख्य चुनाव आयुक्त सुकमार सेन को चुनाव कार्य के लिए सूडान जाना पड़ा था। चुनाव आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करवाने के लिए कोई अतिरिक्त स्टाफ उपलब्ध नहीं था। इस सब परेशानियों के बावजूद विलंब से पहली रिपोर्ट प्रकाशित हो गई। इस दोनों खंडों की रिपोर्ट में देश के पहले चुनाव से जुड़ी हर प्रकार की जानकारी उपलब्ध है। चुनाव परिणाम विस्तृत जानकारियों के साथ दिए है। राज्यों के नाम जरूर आज के नामों से भिन्न है। राज्यों के पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट और राज्यों का नए सिरे से सीमांकन होने के बाद 1957 में हुए चुनावों में सभी प्रकार से स्थिति साफ हो गई थी।
सेन को पद्मविभूषण दिया गया
प्रथम चुनाव आयुक्त सेन 21 मार्च 1950 से 19 दिसम्बर 1958 तक पद पर रहे। वास्तव में दो आम चुनाव संपन्न करवाने और लोकतंत्र को जनता के अधिकार के साथ संपन्न करवाने वाले सुकमार सेन को 1954 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था।
कुछ दिलचस्प यादें
- 1951 में देश की कुल आबादी 36 करोड़ थी इसमें से 17.3 करोड़ मतदाता थे।
- देश के पहले चुनाव में 45.7 प्रतिशत मतदान हुआ था।
- कांग्रेस की ओर से पं. जवाहर लाल नेहरू, भाकपा की ओर से श्रीपाद अमृत डांगे, भारतीय जनसंघ (अब भाजपा) की ओर से पं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सोशलिस्ट पार्टी की ओर से आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया, किसान मजदूर प्रजा पार्टी के आचार्य कृपलानी मैदान में थे।
पं. नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने फहराया परचम
पहले आम चुनाव में पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व कांग्रेस ने जबर्दस्त जीत हासिल की थी। लोकसभा की 489 सीटों में से कांग्रेस ने 364 जीती थी। दूसरे नंबर पर भाकपा रही, जो 16 सीटें जीतीं। 12 सीटें जीतकर सोशलिस्ट पार्टी तीसरे नंबर पर रही थी। इनके अलावा किसान मजदूर प्रजा पार्टी ने 9, हिंदू महासभा ने 4 और भारतीय जनसंघ व रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को 3-3 सीटों पर जीत हासिल की थी। पहले आम चुनाव में कांग्रेस को 45 प्रतिशत वोट मिले थे।
आंबेडकर समेत कई नेता हारे थे
पहले आम चुनाव में कई दिग्गज नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। देश के पहले कानून मंत्री व संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर को मुंबई की उत्तर मध्य सीट से एन. एस. कर्जोलकर ने हराया था। उनके अलावा किसान मजदूर प्रजा पार्टी के आचार्य कृपलानी भी चुनाव हार गए। इसके बाद आंबेडकर ने कांग्रेस छोड़ दी थी। बाद में आंबेडकर राज्यसभा के सदस्य चुने गए थे।