मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने आदेशों की अवहेलना करने और एक लंबित विवाद में स्थगनादेश देने वाले कानून का प्रावधान न बताने पर महू के अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) राकेश परमार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ ने अधिकारी के इस आचरण पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि बार-बार आदेशों का पालन न करना लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार को दर्शाता है, जो न्याय प्रशासन के प्रति अनादर है।ऐसे अधिकारी को सबक मिलना जरूरी है।
जुर्माने की राशि जमा करने का निर्देश
उच्च न्यायालय ने महू के एसडीओ राकेश परमार को सात दिनों के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के पास 50 हजार रुपये की राशि जमा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने राशि जमा करने की रसीद उच्च न्यायालय रजिस्ट्री में प्रस्तुत करने का आदेश दिया। यदि अधिकारी तय समय में यह राशि जमा करने में विफल रहते हैं, तो रजिस्ट्री इस संबंध में एक रिपोर्ट पीठ के समक्ष प्रस्तुत करेगी। मामला 'लीलाबाई एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य' के नाम से लंबित विवाद से संबंधित है, जिसमें एसडीओ ने अपीलीय प्राधिकारी के रूप में एक आदेश पर रोक लगाई थी।
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बार-बार अवसर देने के बाद भी लापरवाही
अदालत ने 24 जून को राज्य सरकार को एक हलफनामा दायर कर वह वैधानिक प्रावधान स्पष्ट करने का निर्देश दिया था, जिसके तहत एसडीओ ने स्थगनादेश जारी किया था। बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद इस निर्देश का पालन नहीं हुआ। इसके बाद 25 सितंबर को उच्च न्यायालय ने पाया कि हलफनामा अभी भी लंबित है। फिर 9 अक्तूबर को अदालत ने एसडीओ राकेश परमार को देरी का कारण बताने के लिए अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया था। इसके जवाब में अधिकारी ने 13 अक्तूबर को एक हलफनामा प्रस्तुत किया।
अवमानना कार्रवाई के स्थान पर आर्थिक दंड
एसडीओ ने अपने हलफनामे में कहा कि आवेदन और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद ही स्थगनादेश दिया गया था, जो केवल अगली सुनवाई तक सीमित था। उन्होंने दावा किया कि 9 जून को मामला आने पर इसे आगे नहीं बढ़ाया गया और 24 जून के उच्च न्यायालय के निर्देश की जानकारी मिलने के बाद 27 जुलाई को आवश्यक आदेश पारित कर दिया गया। हालांकि उच्च न्यायालय ने पाया कि हलफनामे में उस वैधानिक प्रावधान की स्पष्ट जानकारी नहीं थी जो रोक लगाने का अधिकार देता है, यद्यपि संलग्न कार्रवाई में धारा 52 का उल्लेख था।
अधिकारी 9 अक्तूबर को भी यह कहते हुए अनुपस्थित रहे कि वे सुनवाई समाप्त होने के बाद पहुंचे थे। पीठ ने माना कि स्वेच्छा से आदेश न मानने पर अवमानना की कार्रवाई शुरू की जा सकती थी लेकिन न्यायिक आदेशों का अनादर करने वाले अधिकारियों को सबक सिखाने के मकसद से यह आर्थिक दंड लगाया गया। इस मामले पर अगली सुनवाई 2 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में की जाएगी।