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Gwalior: अनोखा भंडारा- ट्रक मिक्सर से बना मालपुए का घोल, ट्रैक्टर ट्रॉली से बांटा गया भोजन

Sat, 28 Jan 2023 08:59 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर

सार

देवनारायण मंदिर पर 22 जनवरी से 28 जनवरी तक कथा हुई। कथा में लगभग पचास हजार श्रद्धालु रोज पहुंचे और दोपहर में सबके लिए भंडारे की व्यवस्था की गई। बैठक व्यवस्था एक किलोमीटर दूर तक खेतों में रखी गई। 
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घाटीगांव इलाके में स्थित सिरसा के देवनारायण मंदिर पर भव्य भंडारा हुआ। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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ग्वालियर जिले के घाटीगांव इलाके में स्थित सिरसा के देवनारायण मंदिर पर कथा संपन्न हुई है। कथा में लगभग पचास हजार श्रद्धालु रोज पहुंचे और दोपहर में सबके लिए भंडारे की व्यवस्था की गई। बैठक व्यवस्था एक किलोमीटर दूर तक खेतों में रखी गई। भंडारे का भोजन बनाने के पीछे की कहानी भी रोचक है।
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व्यवस्थापकों ने बताया कि देवनारायण मंदिर पर यह भंडारा 22 जनवरी से 28 जनवरी तक जारी रहा। भंडारे के लिए बनने वाली खीर के लिए रोजाना 40 क्विंटल दूध की जरूरत होती थी, जो गांव वालों के घरों से जुटाया गया। बड़े-बड़े कड़ाहों में निरंतर खीर बनती रही। रखने के लिए ईंट और सीमेंट से बड़े-बड़े हौद बनाए गए थे। भंडारे में परोसी जाने वाली आलू की सब्जी विशेष होती थी। यह खड़े मसालों से बनाई जाती थी और इसमें प्याज या लहसुन नहीं डाला जाता था। इसमें धोकर साबुत आलू कड़ाहे में डालकर सरसों का तेल और मसाले डालकर इन्हें खूब घोंटा जाता है। इसीलिए इसे घुटमा आलू कहते हैं।

मिक्सर से बना मालपुआ का घोल
भंडारे में खास आकर्षण शक्कर ,पानी और गेहूं के आटे के घोल से बना हुआ मालपुआ रहा। इसको बनाने वाले एक्सपर्ट हलवाई तय थे। सबसे मुश्किल काम रहा इसके लिए इतनी बड़ी मात्रा में घोल तैयार करना। लगभग पचास क्विंटल आटे से रोज मालपुआ बने। इसका घोल तैयार करने के लिए भवन निर्माण में आरसीसी घोल तैयार करने में प्रयुक्त होने वाले अनेक मिक्सर प्लांट यहां लगाए गए थे, जिन्हें रोज लगभग दस घंटे काम करना होता था। तब 50 हजार लोगों के लिए मालपुए का घोल तैयार हो पाता था।
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भोजन वितरण का काम होता ट्रैक्टर ट्रॉली से हुआ
भंडारे में लंबी-बी कतारें लगी रहती थीं और वितरण का जिम्मा आसपास गांव के लोग बारी -बारी से निभाते थे। भोजन बांटने के लिए ट्रैक्टर ट्रॉलियों की मदद ली गई। इनमें भरकर खीर, सब्जी, मालपुआ से लेकर पत्तलें तक बांटी गईं। एक बार में एक से डेढ़ हजार लोगों को बैठाया जाता था।
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