किसी भी अनुष्ठान या पूजा-पाठ कार्यक्रम में भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले होती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा गया है। आज देशभर में गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है। आज के दिन भक्त गणपति बप्पा को नियम-निष्ठा के साथ अपने घर लाते हैं या फिर मंदिरों में दर्शन करने जाते हैं। देश में भगवान गणेश की कई सिद्ध मंदिरें हैं। सुबह से ही श्रद्धालु भगवान गणेश के दरबार में पहुंच रहे हैं। लेकिन, मध्यप्रदेश इकलौता राज्य है, जहां एक साथ चार गणेश मंदिर विश्वविख्यात है। आइए आज हम आपको चार प्रसिद्ध गणेश मंदिरों की कहानी बताते हैं, जहां सिर्फ प्रदेश के लोग ही नहीं बल्कि देश और दुनिया के लोग मनोकामना पूरी करने के लिए पहुंचते हैं ।
ग्वालियर में तानसेन ने गणेश मंदिर में बैठकर 'श्रीगणेश स्तोत्र’ की रचना की
धार्मिक मान्यता के अनुसार, संगीत सम्राट तानसेन ने ग्वालियर के बेहट में स्थित शिवालय व गणेश मंदिर में बैठकर ही ‘श्रीगणेश स्तोत्र’ की रचना की थी। बेहट के ऐतिहासिक झिलमिलेश्वर शिव मंदिर में तानसेन को आवाज मिली, वहीं गणेश मंदिर परिसर में वे संगीत का रियाज करते थे। ग्वालियर से 55 किमी दूर तानसेन की जन्म स्थली बेहट के ऐतिहासिक गणेश मंदिर की रोचक कहानी है। बचपन में हकलाने वाले तानसेन को उनके पिता बेहट के शिवालय के बगल में बने गणेश मंदिर में दर्शन के लिए लाए थे।
एक बार तानसेन के संगीत से शिव मंदिर टेढ़ा हो गया था। बालक तानसेन की भक्ति से भगवान शिव इतने प्रसन्न हुए कि उन्हें साक्षात दर्शन देते हुए उनसे संगीत सुनने की इच्छा प्रकट की। शिवजी के कहने पर तानसेन ने ऐसी तान छेड़ी कि शिव मंदिर ही टेढ़ा हो गया। यह झुका हुआ शिव मंदिर आज भी झिलमिल नदी के किनारे तानसेन की साधना स्थली का गवाह है।
उज्जैन में चिंतामण गणेश मंदिर
मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में भगवान गणेश का प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर महाकाल मंदिर से 6 किलोमीटर की दूरी पर है। यह प्राचीन मंदिर चिंतामण गणेश के नाम से प्रसिद्ध है।चिंतामण गणेश मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में हुआ। गणेश जी के इस प्रसिद्ध मंदिर के गर्भगृह में तीन प्रतिमाएं स्थापित है। गौरीसुत गणेश की तीन प्रतिमाएं गर्भगृह में प्रवेश करते ही दिखाई देती हैं, यहां पार्वतीनंदन तीन रूपों में विराजमान हैं। पहला चिंतामण, दूसरा इच्छामन और तीसरा सिद्धिविनायक। यहां दर्शन करने वाले व्यक्ति की सभी चिंताएं खत्म हो जाती है और वे चिंता मुक्त हो जाते हैं। बुधवार के दिन यहां श्रृद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि इस मंदिर में बिना मुहूर्त भी शादी कराई जाती है। हर साल 300 जोड़े यहां विवाह के लिए पहुंचते हैं।
सीहोर में चिंतामण सिद्ध गणेश : विक्रमादित्य के शासनकाल में प्रतिमा की स्थापना
सीहोर में चिंतामण सिद्ध गणेश में प्रतिमा आधी जमीन में धंसी है। मंदिर में स्थापित प्रतिमा को लेकर दो मान्यताएं हैं। चिंतामण गणेश मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना विक्रमादित्य ने की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां स्थापित मूर्ति भगवान गणेश ने उन्हें स्वयं दी थी। मान्यताओं के मुताबिक, एक बार गणेश जी राजा विक्रमादित्य के सपने में आएं और बताया कि पार्वती नदी के तट पर पुष्प रूप में मेरी मूर्ति है, इसे स्थापित करो। स्वपन में जो बातें गणेश जी ने राजा को बताया था, उसी तरह विक्रमादित्य ने किया। जब वे पार्वती नदी के तट पर पहुंचे तो उन्हें पुष्प मिला। इसके बाद राजा वह पुष्प लेकर वापस लौटने लगे। इस दौरान रास्ते में पुष्प अचानक गिर गया और वह श्रीगणेश की मूर्ति के रूप में परिवर्तित होकर जमीन में धंस गई।
विक्रमादित्य उसे निकालने का प्रयास कर रहे थे, पर वह जमीन में धंसने लगी। इसके बाद उन्होंने प्रतिमा यही स्थापित कर दी। वहीं, दूसरी मान्यता के अनुसार, अपने साम्राज्य का विस्तार करने निकले पेशवा बाजीराव सीहोर पहुंचे तो यहां पार्वती उफान पर थी। लोगों ने बताया कि यहां गणेशजी स्वयं विराजमान हैं। उनकी आराधना करें तो नदी शांत हो जाएगी । उन्होंने प्रार्थना की तो ऐसा ही हुआ, उनके निर्देशानुसार यहां मंदिर का विस्तार कराया गया।।
इंदौर में खजराना गणेश : होलकर घराना राजबाड़ा ले जाना चाहते थे गणेश प्रतिमा, लेकिन यही पर रुक गए प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश
इंदौर के खजराना मंदिर के बारे में कथाओं में अलग मान्यता है। गणेश प्रतिमा पास ही एक बावड़ी में मिली थी। मंदिर का जीर्णोद्धार 1735 में शुरू हुआ। तत्कालीन होलकर घराने की इच्छा थी कि प्रतिमा को राजबाड़ा लेकर आएं और यहां मंदिर बनाकर स्थापित करें। इसके लिए उन्होंने बहुत प्रयास किया, लेकिन गणेश प्रतिमा टस से मस नहीं हुई। अंतत: इसे भगवान की इच्छा मानकर वहीं मंदिर बनाने का निर्णय हुआ। आज भी बावड़ी उसी स्वरूप में परिसर में मौजूद है। मंदिर के पुजारी पं. अशोक भट्ट बताते हैं कि यह प्रतिमा परमारकालीन है। गणेशजी के लिए 65 किलो चांदी का यह सिंहासन जयपुर में बनाया जा रहा है। गणेश चतुर्थी पर खासतौर पर मोतियों का चोला चढ़ाया जाएगा। चार किलो सोने से बने स्वर्ण आभूषण भगवान गणेशजी, रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ को पहनाए जाएंगे। मंदिर में हर महीने करीब 40 लाख रुपए चढ़ावा आता है। यहां के अन्न क्षेत्र में हर दिन 1800 लोग नि:शुल्क भोजन करते हैं