मध्यप्रदेश में चुनावी साल में व्यापमं घोटाले से जुड़ी एक एफआईआर सियासी मुद्दा बन गई है। यह एफआईआर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने छह दिसंबर को दर्ज की है। वह भी पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की 2014 में की गई शिकायत के आधार पर।
आठ साल बाद हुई इस एफआईआर ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मंत्रियों समेत भाजपा के दिग्गज नेताओं के नाम होने की वजह से संगठन भी नाराज है। सबसे बड़ा सवाल इस एफआईआर की टाइमिंग को लेकर है। इस शिकायत में मेडिकल कॉलेज में व्यापमं के अधिकारियों, सरकार के मंत्रियों और बीजेपी नेताओं के सहयोग से फर्जी तरीके से एडमिशन लेने का आरोप है।
राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने 2014 में व्यापमं घोटाले की शिकायत एडीजी सुधीर साही को की थी। इस शिकायत में 2006 के बाद मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए व्यापमं की तरफ से ली गई परीक्षा में घोटाले का आरोप है। शिकायत में कहा गया कि अधिकांश परीक्षा में कुछ लोगों ने आर्थिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से व्यापमं के अधिकारियों से सांठ-गांठ की और मध्यप्रदेश शासन के मंत्री, भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा अन्य के प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग से इस व्यापमं घोटाले को अंजाम दिया गया।
2014 में हुई थी शिकायत
इस एफआईआर में सरकार के मंत्रियों और नेताओं के जिक्र से बीजेपी घिर गई है। एफआईआर में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की लिखित शिकायत के बाद एसटीएफ भोपाल ने प्रकरण क्रमांक 311/14 की लंबित जांच के बाद भारतीय दंड विधान की धारा 419, 420, 467, 468, 471, 120 B के तहत आठ लोगों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया गया है।
कांग्रेस ने उठाए सवाल
इस मामले में कांग्रेस मीडिया विभाग के अध्यक्ष केके मिश्रा का कहना है कि जब सरकार की ही अधीनस्थ जांच एजेंसी ने स्वीकार कर लिया है कि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और अधिकारियों ने मिलकर व्यापमं घोटाले को अंजाम दिया तो ईमानदार कौन? असली दोषी बाहर क्यों हैं? अब यह तथ्य भी सार्वजनिक होना चाहिए कि एफआईआर दर्ज होने इतना विलंब किसके दबाव में हुआ?