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MP: प्राथमिक शिक्षा में ड्रॉपआउट शून्य, 23 साल में बदली सरकारी स्कूलों की तस्वीर; 3 लाख बच्चे लौटे स्कूल

Wed, 16 Sep 2026 05:36 PM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

मध्य प्रदेश में प्राथमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की दर 2025-26 में शून्य प्रतिशत हो गई है। सरकार के मुताबिक साइकिल, स्कूटी, लैपटॉप, छात्रवृत्ति और अन्य योजनाओं से बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने में मदद मिली है।
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सांकेतिक फोटो
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विस्तार
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मध्य प्रदेश में प्राथमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या अब शून्य प्रतिशत तक पहुंच गई है। स्कूल शिक्षा विभाग के अनुसार वर्ष 2002-03 में प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 15 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2025-26 में घटकर शून्य हो गई। इसी अवधि में माध्यमिक स्तर की ड्रॉपआउट दर 24.70 प्रतिशत से घटकर 6.2 प्रतिशत रह गई है। सरकार का कहना है कि स्कूलों तक बच्चों की पहुंच बढ़ाने, आर्थिक मदद देने और पढ़ाई को आसान बनाने के लिए चलाई जा रही योजनाओं का इसमें योगदान रहा है। साइकिल, गणवेश, छात्रवृत्ति, लैपटॉप और स्कूटी जैसी योजनाओं के साथ डिजिटल शिक्षा और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर भी जोर दिया गया है।
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3 लाख से ज्यादा बच्चे फिर स्कूल लौटे
स्कूल से बाहर बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए गृह संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। शिक्षक घर-घर जाकर ऐसे बच्चों की पहचान करते हैं और जरूरत के अनुसार उनका स्कूल में प्रवेश कराया जाता है। विभाग के मुताबिक इस अभियान के जरिए अब तक 3 लाख से अधिक बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ा गया है। वर्ष 2004-05 में शुरू की गई साइकिल योजना के तहत अब तक एक करोड़ से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो चुके हैं। इस योजना पर सरकार अब तक 2,942.63 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुकी है। शुरुआत में यह योजना शासकीय स्कूलों की कक्षा 6वीं और 9वीं की छात्राओं के लिए शुरू की गई थी।
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23 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों को मिली स्कूटी
मेधावी विद्यार्थियों के लिए वर्ष 2022-23 से मुख्यमंत्री स्कूटी योजना संचालित है। योजना के तहत अब तक 23,487 विद्यार्थी लाभान्वित हुए हैं। सरकार करीब 246 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। मोटराइज्ड स्कूटी के लिए अधिकतम 90 हजार और ई-स्कूटी के लिए 1.20 लाख रुपये तक की राशि दी जाती है। हायर सेकेंडरी परीक्षा में 75 प्रतिशत या उससे अधिक अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों को लैपटॉप खरीदने के लिए 25 हजार रुपये दिए जाते हैं। वर्ष 2009-10 से चल रही इस योजना में अब तक 6 लाख 47 हजार 599 विद्यार्थियों को राशि दी जा चुकी है।

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799 पीएमश्री स्कूल, 4.80 लाख विद्यार्थी 
मध्य प्रदेश में कक्षा 9वीं से 12वीं तक व्यावसायिक शिक्षा चलाने वाले स्कूलों की संख्या बढ़कर 3,367 हो गई है। विभाग के अनुसार यह संख्या देश में सबसे अधिक है। वर्ष 2025-26 में 5 लाख 98 हजार 452 विद्यार्थियों ने इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश लिया। पिछले दो वर्षों में 1,010 स्कूलों में एग्रीकल्चर ट्रेड भी शुरू किया गया है। प्रदेश में शिक्षा का बजट भी पिछले दो दशक में तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2002-03 में शिक्षा बजट 2,456 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2026-27 में बढ़कर 9,623.12 करोड़ रुपये हो गया है। यानी करीब चार गुना वृद्धि हुई है।वर्ष 2025-26 में हाई स्कूल का परीक्षा परिणाम 73.42 प्रतिशत, जबकि हायर सेकेंडरी का परिणाम 76.01 प्रतिशत रहा। सरकार का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए लगातार नई व्यवस्थाएं लागू की जा रही हैं। प्रदेश में 799 पीएमश्री स्कूल संचालित हैं, जिनमें करीब 4 लाख 80 हजार विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इसके अलावा पहले चरण में 368 सांदीपनि विद्यालय शुरू किए गए हैं। इन स्कूलों में आधुनिक सुविधाओं और बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है।
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19 लाख छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन के लिए डीबीटी
कक्षा 7वीं से 12वीं तक पढ़ने वाली छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन के लिए हर साल 300 रुपये की राशि सीधे बैंक खाते में दी जाती है। सितंबर 2025 में करीब 19 लाख छात्राओं के खातों में 57 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए। कक्षा 1 से 8 तक के करीब 60 लाख विद्यार्थियों को हर साल दो जोड़ी गणवेश के लिए 600 रुपये की राशि दी जा रही है। इस पर सरकार करीब 360 करोड़ रुपये सालाना खर्च करती है। प्रदेश के 9,316 हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों में से 8,870 स्कूलों में स्मार्ट क्लास स्वीकृत हैं। इनमें 7,405 स्मार्ट क्लास कार्यशील हैं। इसी तरह 8,754 स्कूलों में आईसीटी लैब स्वीकृत हैं, जिनमें 3,706 कार्यशील हैं। इसके अलावा छात्रावासों के संचालन को डिजिटल बनाने के लिए ई-हॉस्टल एडमिशन एवं मैनेजमेंट सिस्टम लागू किया गया है। पीएम-जनमन के तहत 106 और धरती आबा अभियान के तहत 104 छात्रावास भी स्वीकृत किए गए हैं।

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23 साल में तस्वीर कितनी बदली?
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2002-03 में जहां प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 15 प्रतिशत थी, वहीं 2025-26 में यह शून्य हो गई। इसी दौरान शिक्षा बजट 2,456 करोड़ से बढ़कर 9,623.12 करोड़ रुपये हुआ। सरकार अब स्कूलों में बच्चों को बनाए रखने के साथ शिक्षा की गुणवत्ता, कौशल विकास और डिजिटल सुविधाओं पर जोर दे रही है।
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