नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश पर गठित समिति ने बुधवार को भोपाल स्थित कलियासोत और केरवा बांध के तटीय इलाकों में संयुक्त सर्वेक्षण किया। जांच के दौरान कलियासोत तालाब के जलभराव क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे, पक्के निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां पाई गईं। सर्वे टीम ने वाल्मी के सामने स्थित मोटल शिराज की संपत्ति से ग्राउंड ट्रुथिंग कार्रवाई की शुरुआत की। जांच दल ने सबसे पहले निचले क्षेत्र में स्थित मुनारों की स्थिति तथा पानी के वास्तविक स्तर का जायजा लिया।
तालाब क्षेत्र में मिले पक्के निर्माण
टीम ने व्यवसायी राजेश वाधवानी के स्वामित्व वाले क्षेत्र में पहुंचकर पानी के पीछे मौजूद मुनारों और फुल टैंक लेवल (एफटीएल) से उनके संबंध का सूक्ष्म निरीक्षण किया। इस दौरान, एफटीएल से महज 10 फीट की दूरी पर मछली फार्म और उससे सटी डेयरी का संचालन होता हुआ पाया गया, जहां पक्का निर्माण भी है। स्थानीय स्तर पर इस संपत्ति को एक पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से संबंधित बताया जा रहा है। टीम वार्ड 26 स्थित ग्राम खुदागंज पहुंची, जहां कई स्थानों पर जलस्तर एफटीएल सीमा तक पहुंचा हुआ मिला। यहां दर्जनों रेस्टोरेंट और व्यावसायिक निर्माण पानी की सीमा से बिल्कुल सटे हुए पाए गए। जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने सीमा को लेकर भ्रम दूर करने के उद्देश्य से एफटीएल दर्शाने वाले पत्थरों की वास्तविक लोकेशन सुनिश्चित की।
जलभराव में बनी सड़क और मुनारें
कलियासोत तालाब क्षेत्र में सबसे गंभीर मामला जलभराव क्षेत्र के भीतर से ही सड़क का निर्माण किया जाना पाया गया है। जांच में यह तथ्य सामने आया कि प्रभावशाली लोगों के बड़े रेस्टोरेंट और व्यावसायिक ढांचे तालाब की सीमा के भीतर या बेहद पास बनाए गए हैं। कई स्थानों पर जमीन की प्लॉटिंग करने की नीयत से मुनारें गाड़ दी गई हैं, जिससे पानी के प्राकृतिक बहाव और जलभराव का रास्ता बुरी तरह बाधित हो रहा है।
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पंद्रह सितंबर को पेश होगी रिपोर्ट
केरवा क्षेत्र के निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने पाया कि वर्तमान में वहां एफटीएल पर पानी उपलब्ध नहीं है। जलस्तर कम होने के कारण फिलहाल इस क्षेत्र में ग्राउंड ट्रुथिंग और सर्वे संभव नहीं हो सका। समिति के सदस्यों और अधिकारियों के बीच हुई चर्चा में सर्वसम्मति बनी कि 15 सितंबर को एनजीटी के समक्ष केरवा बांध से जुड़े तकनीकी व व्यावहारिक पहलुओं की विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाएगी। अदालत से निर्देश मिलने के बाद ही केरवा क्षेत्र में आगे की कार्रवाई होगी। याचिकाकर्ता राशिद नूर खान ने कहा कि भू-माफिया को कानूनी पेंच का लाभ उठाने से रोकने के लिए पुरानी मुनारों, जलस्तर और प्राकृतिक जल प्रवाह का वैज्ञानिक रिकॉर्ड बनना जरूरी है।