प्रदेश में सरकारी कामकाज से जुड़ी शिकायतों को लेकर राजपत्रित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सीधे आपराधिक कार्रवाई करना अब आसान नहीं होगा। पुलिस मुख्यालय की नई गाइड लाइन के तहत पदीय दायित्व से जुड़े मामलों में एफआईआर या अदालती कार्रवाई से पहले राज्य सरकार से अभियोजन की पूर्व स्वीकृति लेना अनिवार्य किया गया है। पीएचक्यू ने प्रदेश की सभी जिला इकाइयों को इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं।
पद के दुरुपयोग की होगी जांच
पीएचक्यू की अपराध अनुसंधान शाखा की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार अब केवल शिकायत के आधार पर पुलिस अधिकारी के खिलाफ सीधे कार्रवाई नहीं की जाएगी। अभियोजन स्वीकृति देने से पहले शासन स्तर पर यह देखा जाएगा कि शिकायत वास्तव में पद के दुरुपयोग से संबंधित है या नहीं। यदि मामला अधिकारी के पदीय दायित्व और शासकीय कर्तव्य के निर्वहन से जुड़ा पाया जाता है तो अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले शासन की अनुमति जरूरी होगी।
हाईकोर्ट के आदेश का दिया गया हवाला
पीएचक्यू ने ग्वालियर हाईकोर्ट की खंडपीठ के 19 जुलाई 2026 के आदेश का भी संदर्भ दिया है। इस मामले में बिना पूर्व अभियोजन स्वीकृति के दर्ज शिकायत के आधार पर हुई कार्रवाई को अदालत ने निरस्त कर दिया था। पीएचक्यू ने सभी जिला इकाइयों को इस निर्णय का गहन अध्ययन करने और जरूरत के अनुसार संबंधित न्यायिक दृष्टांतों का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं।
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दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से होगी सुरक्षा
नई व्यवस्था को ड्यूटी के दौरान पुलिस अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण या बेबुनियाद शिकायतों से सुरक्षा देने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि पदीय कर्तव्य से जुड़े मामलों में सरकार की पूर्व स्वीकृति जरूरी होगी तो आम लोगों के लिए पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की न्यायिक प्रक्रिया अधिक जटिल हो सकती है। बहरहाल पीएचक्यू ने सभी जिला इकाइयों को नई व्यवस्था के अनुरूप कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।