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Betul News: मर कर भी अमर हो गईं इंदूमती की आंखें, जिला अस्पताल में 5वां नेत्रदान

Sat, 01 Jun 2024 10:48 PM IST
अरविंद कुमार न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, बैतूल

सार

इंदूमती जैन जो भले ही अब इस दुनिया में नहीं रहीं। मगर अब उनकी आंखें इस दुनिया को देखेंगी। दरअसल, जैन ने अपनी आंखें दान करने की इच्छा परिवार के समक्ष रखी थी।
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अमर हो गईं इंदूमती की आंखें - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कहते हैं इंसान के मरने के बाद बस उनकी यादें ही रह जाती हैं। मगर कुछ लोग ऐसे अविरल होते हैं, जो की मरने से पहले अपने अंगों को दान करने की इच्छा जता देते हैं। फिर भले वो इंसान रहे या न रहे, उनके शरीर का अंग किसी जरूरतमंद के काम आ जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ मध्यप्रदेश के बैतूल में, जहां एक बुजुर्ग महिला की मौत के बाद उनके नेत्रदान किए गए।

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हम बात कर रहे हैं इंदूमती जैन की, जो भले ही अब इस दुनिया में नही रहीं। मगर अब उनकी आंखें इस दुनिया को देखेंगी। दरअसल, जैन ने अपनी आंखें दान करने की इच्छा परिवार के समक्ष रखी थी। अब उनकी मृत्यु के बाद उनके नेत्रदान हो चुके हैं और इन आंखों को भोपाल ले जाया गया।

मध्यप्रदेश के बैतूल में शनिवार सुबह राजेश, भरत जैन की माता इंदूमती पति स्वर्गीय जगदीश चंद जैन (84) का निधन हो गया था। जैसा कि उन्होंने निधन से पहले नेत्रदान की इच्छा परिवार वालों के समक्ष रखी थी। इसीलिए परिजनों ने रेड क्रास सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. अरूण जय सिंह पुरे से संपर्क किया और अपनी माता की इच्छा के बारे में बताया। फिर परिवार जनों द्वारा जैन का शव जिला अस्पताल लाया गया, जहां नेत्रदान की प्रक्रिया संपन्न हुई। डॉक्टरों द्वारा ऑपरेशन कर उनकी दोनों आंखें निकाली गई और इन्हें सुरक्षित रूप से हमीदिया भोपाल के आई बैंक भेजा गया।
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ऑपरेशन करने वाले नेत्र विशेषज्ञ डॉक्टर वरुन उपाध्याय का कहना है कि नेत्रदान के लिए सबसे पहले आईबाल और कार्निया निकाला गया। इसके साथ ही ब्लड सैंपल लिया गया और कार्निया सैंपल भी लिया। इन्हें भोपाल भेजा गया है। आंखें निकालने के लिए किए गए ऑपरेशन के दौरान नेत्र विशेषज्ञ डॉ. विनोद बर्डे, डॉ. साबिया, डॉ. अंजुम, गीता सिस्टर, परते सिस्टर सहित अन्य स्टॉफ मौजूद था, जिनके सहयोग से आपरेशन संपन्न कराया गया। 

नेत्रदान को लेकर समाजसेवी सतीष पारीख ने बताया कि राजेश और भरत जैन की माता इंदूमती जैन काफी धार्मिक प्रवृत्ति की थी और दानी प्रवृत्ति की भी थीं। हमेशा दान पुण्य के कार्यों में अग्रणी रहती थीं। उन्होंने अपने जीवित रहते नेत्रदान की इच्छा व्यक्त की थी। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए उनके परिजनों ने निधन के तत्काल पश्चात ही उनके नेत्रदान की प्रक्रिया करवाई।

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